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दीवाली पर एक नवगीत

क्यों रे दीपक
क्यों जलता है,
क्या तुझमें
सपना पलता है...?!

हम भी तो
जलते हैं नित-नित
हम भी तो
गलते हैं नित-नित,
पर तू क्यों रोशन रहता है...?!

हममें भी
श्वासों की बाती
प्राणों को
पीती है जाती,
क्या तुझमें जीवन रहता है...?!

तू जलता
तो उत्सव होता
हम जलते
तो मातम होता,
इतना अंतर क्यों रहता है...?!

तेरे दम
से दीवाली हो
तेरे दम
से खुशहाली हो,
फिर भी तू चुप - चुप रहता है...?!

चल हम भी
तुझसे हो जायें
हम भी जग
रोशन कर जायें,
मन कुछ ऐसा ही करता है...!!

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

- विशाल चर्चित

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Comment by Kiran Arya on December 9, 2013 at 1:29pm

चल हम भी
तुझसे हो जायें
हम भी जग
रोशन कर जायें,
मन कुछ ऐसा ही करता है........एक सुंदर चाहना विशाल

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on November 6, 2013 at 11:20pm

विजय सर जी आभार !!!

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on November 6, 2013 at 11:20pm

बहुत - बहुत शुक्रिया जितेंद्र भाई !!!!

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on November 6, 2013 at 11:20pm

गिरिराज सर जी आभार !!!!

Comment by विजय मिश्र on October 29, 2013 at 3:15pm
बहुत सुंदर गीत , उत्तम भावों से युक्त .बधाई चर्चितजी
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 29, 2013 at 11:09am

सुंदर गीत, मन को छू गया, बधाई स्वीकारें आदरणीय विशाल भाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 28, 2013 at 9:55pm

आदरणीय विशाल भाई , बहुत लाजवाब गीत रचना की है !!!! आपको तहे दिल से हार्दिक बधाई !!!!!

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on October 28, 2013 at 9:31pm

आशुतोष सर जी प्रणाम.... आपको इस मंच पर देख कर अतिशय प्रसन्नता हुई है....!!!!

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on October 28, 2013 at 9:30pm

अरे विचार क्या करना राजेश भाई.... मैंने तो फौरन अमल भी कर दिया.... आखिर आपने इतनी अच्छी सलाह ही दी थी..... सच में हृदय से आभारी हूं आपका भाई कि आपने ध्यान दिलाया....!!!!

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on October 28, 2013 at 6:43pm

शरदिंदु जी आपका हृदय से आभार....... बहुत अच्छा लगा कि आपने गौर से पढा.... और कुछ सलाह के लायक समझा.....वैसे अब मैं आपको अपनी बात बता दूं कि क्यों //मन कुछ ऐसा ही करता है.../// लिखा.....दरअसल अपनी रचनाओं में कोशिश करता हूं कि मैं वैसा ही लिखूं जैसा कि हम रोजमर्रा की जिन्दगी में रहते हैं बात करते हैं.... जिन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं.....आम बोलचाल में चूंकि 'मन करता है' ही बोला जाता है 'मन कह्ता है' नहीं..... इसलिये ये प्रयोग ज्यादा सटीक - आम जिन्दगी के ज्यादा करीब लगा.....बस इसलिये....!!!!

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