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ग़ज़ल - आज तू दर्द को ज़जा कहना । - पूनम शुक्ला

2122 1212 22
खत्म होती नहीं सजा कहना
बेरहम क्यों हुई रज़ा कहना

आशियाना सजा लिया हमने
तीरगी घेरती वज़ा कहना

आज फिर याद खूब आती है
मोतबर दर्द को मज़ा कहना

चाह कर भी सजा नहीं होगी
आज तू दर्द को ज़जा कहना

जान पर खेल कर कभी अपनी
जिन्दगी बाँटना क़जा़ कहना ।

दिन ब दिन बदलियाँ हटेंगी भी
जिन्दगी को न बेमज़ा कहना

कज़ा- ईश्वरीय आदेश
रज़ा - इच्छा
ज़जा - फल
मोतबर=जिसका एतबार किया हो,विश्वस्त

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 17, 2013 at 2:28pm

बधाई स्वीकारें, पूनम जी..

Comment by Sushil.Joshi on October 15, 2013 at 3:31am

बेहद सुंदर गज़ल कही है आदरणीया पूनम जी...

Comment by कल्पना रामानी on October 13, 2013 at 10:48pm

सुंदर गज़ल के लिए हार्दिक बधाई पूनम जी

 

Comment by बृजेश नीरज on October 13, 2013 at 6:25pm

बढ़िया ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on October 13, 2013 at 3:30pm

दिन ब दिन बदलियाँ हटेंगी भी
जिन्दगी को न बेमज़ा कहना |

वाह बढ़िया ग़ज़ल पूनम जी  !

Comment by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 12, 2013 at 6:05pm

खूबसूरत ग़ज़ल...............

आज फिर याद खूब आती है
मोतबर दर्द को मज़ा कहना

Comment by वीनस केसरी on October 12, 2013 at 1:38am

आज फिर याद खूब आती है
मोतबर दर्द को मज़ा कहना

वाह ...

सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकारें

सज़ा में "ज़े" होता है अर्थात इसमें भी नुक्ता लगेगा ...

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 11, 2013 at 5:12pm

आदरणीया पूनम जी ..इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by Abhinav Arun on October 11, 2013 at 8:04am

अच्छी ग़ज़ल आ. पूनम जी हार्दिक बधाई और शुभकामनायें !

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on October 10, 2013 at 8:41pm
आदरणीया पूनम जी! सुन्दर गजल है। भाव और कथ्य दोनों ही उत्तम हैं।
आदरणीय अरुण भाई जी! मेरे मतानुसार काफिया सही है।

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