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"डॉ साहिब, हमें बेटी नहीं चाहिए. आप बहू का एबॉर्शन कर दीजिए."
"ठीक है, आप लोग कल शाम मेरे प्राइवेट क्लिनिक पर आ जाईए".
"कल नहीं डॉ साहिब, हम लोग अगले हफ्ते ही आ पाएंगे"
"अगले हफ्ते क्यों ?"
"क्योंकि अभी नवरात्रे चल रहे हैं "

(मौलिक एवँ अप्रकाशित्)

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Comment by अरुन 'अनन्त' on October 6, 2013 at 10:41am

आदरणीय बेहद सशक्त लघुकथा इसे कहते हैं गागर में सागर भरना कम शब्दों में कितनी बड़ी बात कह गए आप, इस सुन्दर संदेशात्मक लघुकथा हेतु हृदयतल से हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by vijay nikore on October 6, 2013 at 3:03am

आदरणीय योगराज जी:

 

इतने थोड़े से शब्दों में आपने हमारे समाज की किताब लिख दी है...

बधाई के लिए उचित शब्द नहीं हैं... कृपया स्वीकार करें..

 

सादर,

बधाई

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 5, 2013 at 11:22pm

कम शब्दों में बहुत बड़ी बात, बधाई स्वीकारें आदरणीय योगराज जी

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on October 5, 2013 at 9:32pm

वाह सर वाह क्या बात कह डी चाँद लाईनों में ! अति उम्दा !

Comment by Meena Pathak on October 5, 2013 at 7:55pm

वाह, क्या बात है |कम शब्दों में बहुत बड़ी बात | बधाई स्वीकारें आ० योगराज जी 

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on October 5, 2013 at 7:45pm

आदरणीय अग्रज,

न्यूनतम शब्दों में अधिकतम सम्प्रेषण! इसे ही कहते हैं 'बिंदु में सिंधु'! शुभकामनाएँ,

Comment by Abhinav Arun on October 5, 2013 at 6:26pm

 जी यह लघु कथा है ... एम् ए में कथा के जो तत्व बताये गए थे उनसे युक्त ...बहुत सशक्त और विचारणीय विन्दु को रोचकता के साथ कथा शिल्प में पिरोया गया है ..बहुत बहुत साधुवाद आदरणीय , नमन आपको !!

Comment by रविकर on October 5, 2013 at 5:55pm

उन्हें देवि की यथोचित कृपा प्राप्त हो-

मार्मिक कथ्य-

आभार आदरणीय-

Comment by Kapish Chandra Shrivastava on October 5, 2013 at 4:40pm
 
वाह ! क्या ही सुन्दर लघुकथा है । सिर्फ चार ही  पंक्तियों में इतनी वजनदार बात कही है आपने । कहते हैं  ना--  सतसैया के दोहे ज्यों नाविक के तीर , देखन को छोटे लगे घाव करे गंभीर ॥ कृपया बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें योगराज जी  । 
Comment by वेदिका on October 5, 2013 at 4:13pm

नवरातों के बाद दुर्गा जी तो चली जाएगी फिर कौन देखने वाला है यहाँ,,कुछ भी करो !! 

बहुत मार्मिक कथा आदरणीय योगराज जी!

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