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सारी रतिया जागकर मिलत खिलत बतियात
पलक पलक झपकत रही, नैन रहे लजियात 
नैन रहे लजियात, बेध कर उर मा बासै 
मैन मोय अकुलात,सोच कर उठि उठि सांसै         
कह सागर सुमनाय , प्रेम सौं  नहीं बिमारी 
लगै जो  एकौ  दांय , छुटे न उमर ये सारी 
आशीष श्रीवास्तव - सागर सुमन
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Ashish Srivastava on September 3, 2013 at 8:09pm

श्री जितेन्द्र 'गीत' जी  : सादर आभार 

Comment by Ashish Srivastava on September 3, 2013 at 8:09pm

आ . Saurabh Pandey जी आपकी वाह , एक सफल प्रयास , साभार म


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 1, 2013 at 1:25am

प्रेम न बोलो रोग है,  प्रेम न  दैहिक   जोश 

प्रेम-भाव सुख-जीवनी, सहज सुलभ जो होश

कुण्डलिया पर बहुत सही प्रयास हुआ है.

शुभ-शुभ

Comment by Ashish Srivastava on August 28, 2013 at 11:52am

aadarniya जितेन्द्र 'गीत' Ji sarahna ke liye aabhar 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 28, 2013 at 10:59am

सुंदर कुंडली छंद प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई आदरणीय आशीष जी

Comment by Ashish Srivastava on August 27, 2013 at 10:49pm
सुजान जी बहुत बहुत शुक्रिया उत्साह वर्धन के लिए
Comment by Ashish Srivastava on August 27, 2013 at 10:48pm
annapurna bajpai ji . आदरणीय सराहना के लिए ह्रदय से आभार
Comment by annapurna bajpai on August 27, 2013 at 10:44pm

आ० आशीष जी सुंदर कुण्डलिया छंद की रचना हुई है बहुत बधाई । 

Comment by सूबे सिंह सुजान on August 27, 2013 at 9:03pm
सारी रतिया जागकर मिलत खिलत बतियात
पलक पलक झपकत रही, नैन रहे लजियात
नैन रहे लजियात, बेध कर उर मा बासै
मैन मोय अकुलात,सोच कर उठि उठि सांसै
कह सागर सुमनाय , प्रेम सौं नहीं बिमारी
लगै जो एकौ दांय , छुटे न उमर ये सारी
आशीष श्रीवास्तव - सागर सुमन
....................................जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है.मुझे कुण्डली बहुत अच्छी लगती है कुल चार ही लिखी हैं ..आप से प्रेरित होकर अभी और प्रयास करता हूँ
Comment by Ashish Srivastava on August 27, 2013 at 1:25pm

रविकर  Ji punah aabhar ursaah badhane k liye 

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