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बशर जब से यहाँ पत्थर में ढलना चाहता है

ये बुत भी आज पत्थर से निकलना चाहता है

 

रिहाई मांगता है आदमी दुनिया से फिर भी

जहाँ भर साथ में लेकर निकलना चाहता है

 

तुम्हारी जिद कहाँ तक रोक पाएगी सफ़र को

ये मौसम भी किसी सूरत बदलना चाहता है

 

जिसे पत्थर कहा तूने अभी तक मोम है वो  

जरा सी आंच  तो दे दो पिघलना चाहता है

 

भले सूखा लगे दरिया, मगर पानी वहां पर

जरा सा खोद कर देखो, निकलना चाहता है

बशर= आदमी

 

मौलिक और अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by Dr Lalit Kumar Singh on August 27, 2013 at 5:58pm
Comment by Dr Lalit Kumar Singh on August 27, 2013 at 5:54pm

बहुत बहुत शुक्रिया, अन्नपूर्ण बाजपाई जी 

सादर 

Comment by annapurna bajpai on August 26, 2013 at 8:03pm

आदरणीय ललित जी बहुत ही उम्दा अल्फ़ाजों से नवाज़ी गई आपकी  इस सुंदर गजल के लिए आपको बहुत बधाई ।

Comment by shubhra sharma on August 26, 2013 at 7:24pm

आदरणीय डॉ ललित जी ,
\जिसे पत्थर कहा तूने अभी तक मोम है वो
जरा सी आंच तो दे दो पिघलना चाहता है\
क्या खूब कही है आपकी गजल , वाह वाह .........बधाई

Comment by Shyam Narain Verma on August 26, 2013 at 5:55pm
बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको!
Comment by विजय मिश्र on August 26, 2013 at 5:31pm
नरम दिल की सख्त मिजाजी का अच्छा फौरा है . खूबसूरत गजल ललितजी , बधाई .
Comment by Sonam Saini on August 26, 2013 at 2:43pm

भले सूखा लगे दरिया, मगर पानी वहां पर

जरा सा खोद कर देखो, निकलना चाहता है............ वाह वाह क्या खूब लिखा है आदरणीय ललित कुमार जी...

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 26, 2013 at 12:59pm

वाह वाह आदरणीय बेहद शानदार धारदार ग़ज़ल आनंद आ गया अंतिम तीन अशआरों ने तो दिल को स्पर्श कर लिया उनके लिए विशेष तौर पर दिली दाद कुबूल फरमाएं.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 26, 2013 at 12:27pm
ललित भाई , लाजवाब गज़ल हुई है बधाई !!

भले सूखा लगे दरिया, मगर पानी वहां पर
जरा सा खोद कर देखो, निकलना चाहता ---------- बेहतरीन शे र वाह !!

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