For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Dr Lalit Kumar Singh's Blog (17)

रूह भर कर दे

मेरा वजूद बस इक बार बेखबर कर दे

पनाह दे तो असातीन मोतबर कर दे

 

चमन कहीं भी रहे और गुल कहीं भी हो  

मेरे अवाम को बस खुशबुओं से तर कर दे

 

कोई निगाह तगाफुल करे न गैर को भी

सदा उठे जो बियाबाँ से चश्मे-तर कर दे

 

कहाँ-कहाँ न गया हूँ मैं ख्वाब को ढोकर 

मेरा ये बोझ जरा कुछ तो मुक्तसर कर दे

 

तमाम रात अंधेरों से भागता ही रहा

तमाम उम्र उजाला तो रूह भर कर दे

 

तगाफुल= उपेक्षा; असातीन= खम्भा ;…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on August 27, 2013 at 5:51pm — 15 Comments

पिघलना चाहता है

बशर जब से यहाँ पत्थर में ढलना चाहता है

ये बुत भी आज पत्थर से निकलना चाहता है

 

रिहाई मांगता है आदमी दुनिया से फिर भी

जहाँ भर साथ में लेकर निकलना चाहता है

 

तुम्हारी जिद कहाँ तक रोक पाएगी सफ़र को

ये मौसम भी किसी सूरत बदलना चाहता है

 

जिसे पत्थर कहा तूने अभी तक मोम है वो  

जरा सी आंच  तो दे दो पिघलना चाहता है

 

भले सूखा लगे दरिया, मगर पानी वहां पर

जरा सा खोद कर देखो, निकलना चाहता है

बशर=…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on August 25, 2013 at 9:44pm — 9 Comments

सोचने भर से यहाँ कब क्या हुआ

सोचने भर से यहाँ कब क्या हुआ

चल पड़ो फिर हर तरफ रस्ता हुआ

 

जिंदगी तो उम्र भर बिस्मिल रही

मौत आयी तब कही जलसा हुआ

 

रोटियां सब  सेंकने में थे लगे

घर किसीका देखकर जलता हुआ

 

जख्म देकर दूर सब हो जायेंगे

आ मिलेंगे देखकर भरता हुआ

 

चाहिए पत्थर लिए हर हाथ को

इक शजर बस फूलता-फलता हुआ 

               

बिस्मिल = ज़ख्मी 

 

मौलिक और अप्रकाशित 

Added by Dr Lalit Kumar Singh on August 10, 2013 at 6:39am — 16 Comments

भूल जाने का हुनर आता नहीं

दोस्त  बनकर भूल  जाने का हुनर आता नहीं

लोग  कहते  हैं के  दस्तूरे  सफ़र आता नहीं

 

जब रहम  की  आस में दम तोड़ता है आदमी

क्यों किसी के दिल-जिगर में वो असर आता नहीं

 

दरहकीकत  छांव  दे  जो इस जहाँ की धूप से

अब हमारे  ख्वाब  में भी  वो शजर आता नहीं

 

रंग-ओ-खुशबू है मगर,यह टीस है कुछ फूल को

वक्त जब  माकूल  रहता, क्यों समर आता नहीं

 

जब मुकाबिल तोप  की जद में बरसती आग हो

फिर बशीरत के, सिवा कुछ भी नज़र आता…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on August 7, 2013 at 5:54am — 7 Comments

लिख दिया तो लिख दिया

हमने तुम्हारी जात पर,जब लिख दिया तो लिख दिया

कुछ बेतुके जज्बात पर;जब लिख दिया तो लिख दिया

 

कितना सुहाना मुल्क है, तुमने कहा अखबार में

बीमार से हालात पर जब लिख दिया तो लिख दिया   

 

जब से खुले बाजार की रख्खी गयी है नींव तो  

हरदिन लगे आघात पर जब लिख दिया तो लिख दिया

 

नक्कारखाना बन गया, सुनता नहीं, कोई कहीं

दिन-रात के उत्पात पर जब लिख दिया तो लिख दिया

 

कश्ती भंवर में है परेशां, नाखुदा कोई नहीं

फिर…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on August 6, 2013 at 6:30am — 18 Comments

सो करते रहे हम

इसी रास्ते से गुजरते रहे हम

दुआ जानते थे सो करते रहे हम

 

अब आये कभी गम तो फिर देख लेंगे   

यही सोच कर बस संवरते  रहे हम

 

उठाते  बिठाते जगाते रहे है

मुकद्दर को झोली में भरते रहे हम

 

कोई है जो अन्दर, यही देखता है

कब उसकी निगाहों में गिरते रहे हम

 

समझ लें जो खुद को यही बस बहुत है

‘जो मैं हूँ’ , उसीसे तो डरते  रहे हम

 

मौलिक और अप्रकाशित 

Added by Dr Lalit Kumar Singh on August 5, 2013 at 9:44pm — 8 Comments

कुछ दरीचा हो यहाँ पर

भूख थी जेरे बह्स  और प्यास भी था मुद्द'आ 

फैसला होना नहीं था, मुल्तबी वह फिर हुआ 

 

रहमतों की बारिशें होंगी, मुनादी हो गयी 

और बातें छोडिये, पर रोटियों का क्या हुआ

 

लाख बोलो  कान पर,जूँ  तक नहीं अब रेंगता 

क्या असर होगा इन्हें, दो गालियाँ  या बददुआ

 

हाथ इनके हैं बहुत लम्बे, मगर डरना  नहीं  

चाहे  संसद में गढ़ें वो नामुआफ़िक मजमुआ 

 

वारदातें भी रहम की मांगती हैं  हर नज़र

कुछ दरीचा हो यहाँ पर,…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 17, 2013 at 7:09am — 12 Comments

लगे जताने बहुत बड़े है

121    22   121    22

.

जहाँ जरूरी हुआ अड़े हैं,

इसीलिए हम यहाँ खड़े हैं

 

जिन्हें जरूरत जहान भर की

वहीँ मशाइल  बड़े-बड़े हैं

 

समय उन्हीं के लिए बना है

जिन्हें कि हर पल लगे बड़े हैं

 

मिली जरा सी उन्हें जो शुहरत,

लगे जताने बहुत  बड़े है

 

जिन्हें नाकारा  है तेरी दुनिया   

हम उनके हक़ में सदा लड़े हैं

 

किसी की कमियों से क्या है लेना

अगर है खूबी, वहीँ अड़े…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 15, 2013 at 6:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल ५

 

221 2121 1221 212

बेख़ौफ़ सारी उम्र निकल जाये इस तरह

गिरने की बात हो न, संभल जाए इस तरह

 

तूफ़ान भी चले तो चरागा जला करे

दोनों ही अपनी राह बदल जाए इस तरह

 

हर सिम्त जिंदगी रहे, पुरजोश  बारहां

जो मौत का भी होश,बदल जाए इस तरह

 

फैले कहीं जो बाहें तो बच्चों सा दौड़कर

मिलने को हर इक शख्स मचल जाए इस तरह

 

आंसू किसी की आँखों का, हर आँख  से बहे 

इस शहर की फ़ज़ा भी बदल जाये इस तरह…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 7, 2013 at 10:40pm — 12 Comments

बता दो क्या कर लोगे

बता दो क्या कर लोगे

सूरज के ही आगे पीछे रहती है बस  धूप,

बता दो क्या कर लोगे 

उनका पेट भरेगा, तेरी भांड में जाए भूख ,

बता दो क्या कर लोगे 

तेरे ही काँधे पर चढ़कर छोड़ेंगे बन्दूक,

बता दो क्या कर लोगे 

बेटा उनका आगे होगा, तुम्ही जाओगे छूट, 

बता दो क्या कर लोगे 

काला होगा धन उनका जब तेरा पैसा लूट,

बता दो क्या कर लोगे 

कुर्सी तेरी वो बैठेंगे, तुम बस देना घूस,

बता दो क्या कर लोगे

 

मौलिक और…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 5, 2013 at 10:00pm — 16 Comments

प्यार की पराकाष्ठा

मैंने ख्वाबों में देखा है, कल आयेंगे घर सजना 

आज सुबह से थिरक रहे हैं,चंचल चित,व्याकुल नयना

 

घनघोर घटा घर आंगन छाना,तुझमें  ही छुप जाऊंगी

व्यथित ढूंढ जब होंगे प्रिय, तुरत सामने आ जाऊंगी

लग जाऊंगी जब सीने से, झूम बरसना तुम अंगना

              मैंने ख्वाबों में देखा है, कल आयेंगे घर सजना 

 

पी-कहाँ, पपीहे कहते थे तुम, कल तडके घर आ जाना

मेरे साथ ही तुझको भी है, गीत ख़ुशी के फिर गाना

द्वार मिलन पर पलक बिछाए ठुमक रहे मेरे…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 4, 2013 at 10:00pm — 20 Comments

छंदमुक्त

एक क्षण ,

मैंने उस फूल की पंखुड़ी को होठों से,
सहला भर दिया था 
सिहर गयी थी शाख,
जड़ की गहराईयों तक,
हिल उठी थी धरा,
भौंचक था आसमाँ  भी
उस पल 
कितना सहम गया था बागवाँ,
तब, ठिठक कर रुक गया था,
जिंदगी का कारवाँ,
लगा-
कहीं  कोई भूल तो नहीं हो गई,
उफ़!
मैंने…
Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 2, 2013 at 5:30am — 18 Comments

ग़ज़ल -४

कश्ती को बस इक बार जताना है मुझे भी

जब तैर लिया, पार हो जाना है मुझे भी

 

जो अपने सिवा खास किसी को न समझते

कितना हूँ मैं दुश्वार बताना है मुझे  भी

 

तूफाँ  से यही बात कही, मैंने यहाँ पर

हर हाल चरागा ही जलाना है मुझे भी

 

अब छूट घटाओं को कभी दे नहीं सकता

पानी तो हर एक हाल पिलाना है मुझे भी

 

मत सोच सफ़र, पाँव मेरे बांध के रखना

जब वक्त कहे, लौट के आना है मुझे भी

 

जो आग लगाना ही बड़ा काम…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 1, 2013 at 7:00am — 17 Comments

ग़ज़ल- ३

हर कदम खुशियाँ मिले, सबकी कवायद जिस लिए है

राम जाने दर्द क्यों, हर दिल में आखिर किसलिए है

 

भीड़ को तो आपका ही, इक इशारा चाहिए  बस

पीछे-पीछे चल रहा  जो, हाथ में माचिस लिए है

 

लोग मुझसे कह रहे थे, आदमी, इंसान है यह

गौर से देखा, तो जाना, दिल-जिगर बेहिस लिए है

 

मैं लडूंगा जब यहाँ, हर काम उसका भी बनेगा

साथ मेरा दे रहा, यह शख्स अबतक इसलिए है

 

पीठ पीछे, जो यहाँ, मेरी शिकायत कर रहा था

सामने आया तो देखा,…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on June 28, 2013 at 9:26am — 7 Comments

ग़ज़ल- 2

अपने मित्रों की सलाह पर कुछ परिवर्तन के साथ पुनः प्रेषित कर रहा हूँ -

 

जिंदगी इक छलावा  के सिवा क्या है

मौत भी बस, मुदावा के सिवा क्या है 

 

रोशनी की तड़प ही तो, अँधेरा है 

हर उजाला,भुलावा के सिवा क्या है 

 

शानो-शौकत, तमाशा है, यही जाना  

बेवजह ही, दिखावा के सिवा क्या है  

  

होश भी अब, कहीं दिखता नहीं, शायद   

बद्सरंजाम लावा के सिवा   क्या है 

 

मोह में और ममता में उलझ जाना

यह किसी…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on June 27, 2013 at 7:00pm — 5 Comments

यूँ ही चलकर

साधन में, सुधि में, समाधि ,संवाद में, ढूंढता हूँ संजोये नाम

कागज में, पाती में, दीये की बाती में, खोजा है बेसुध  अविराम,

गैर की निगाहों में, पराजायी बाँहों में, या दिन हो या कोई शाम

जख्मों में, टीसों में,आहों में, शीशों में, हो मेरा शायद गुमनाम  

 

डॉ. ललित

मौलिक और अप्रकाशित 

Added by Dr Lalit Kumar Singh on June 27, 2013 at 5:28am — 8 Comments

ग़ज़ल-1

खुशबू समेटने से किसका  हुआ भला   है   

जब-जब चिता जली है, चन्दन वहाँ  जला  है 

 

बैठा रहा तो मुझको खुद से गिला था यारों 

जब चल पड़ा तो सबको हर पल बहुत खला है 

 

अब है किसे पता भी, माहौल कब ये बदले 

हर शख्स देखने में लगता मुझे भला है

 

सुन वो कहाँ रहे थे, चर्चा चली जो मेरी 

बेचैन  हो गए, जब, उनका कहा  भला है  

 

जिसको अजीज़ माना, यूँ दूर ही रहे सब 

जब काम आ पड़ा तो फिर से खलामला…

Continue

Added by Dr Lalit Kumar Singh on June 26, 2013 at 7:30pm — 12 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service