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तुम एक दिन तपकर तो देखो

अपने महलों से निकलकर तो देखो

आओ हम वहां चलते हैं

जहां ईंट बनती है

वो मिट्टी जो रात भर गलती है

बार –बार कटती है ,

तब सांचे में ढलती है

फिर भट्टी में तपती है

तब कहीं वो ईंट बनती है

जो आपके महलों की नींव बनती है

                                    

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 10:46pm

वाह ! सार्थक !!

Comment by hemant sharma on August 8, 2013 at 4:28pm

आदरणीय विजय जी धन्यवाद .......... आपका आभार...............

Comment by vijay nikore on August 8, 2013 at 12:37pm

अति सुन्दर, हेमन्त जी। बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by राज़ नवादवी on August 7, 2013 at 7:50pm

संक्षिप्त और सुन्दर! 

Comment by बृजेश नीरज on August 7, 2013 at 6:59pm

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 6, 2013 at 10:16pm

प्रिय हेमंत शर्मा जी, ओपन बुक्स ऑन लाइन में आपकी प्रथम रचना का हृदय से स्वागत है. मिट्टी से ईंट बनने की प्रक्रिया किसी तप से कम नहीं है.  ईंट के प्रतीक में बहुत ही गम्भीर बात कह गये हैं. बधाई................

Comment by hemant sharma on August 6, 2013 at 9:44pm

मेरी कविता को आशीर्वाद प्रदान करने के लिये आप सभी महानुभावों का सादर आभार ...........नमन .........

ओ बी ओ पर मेरी पहली रचना को मिले आशीर्वाद के लिये मै आप सभी का आभारी हूं ..........नमन .........  

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 6, 2013 at 5:37pm

वाह ! बहुत सुन्दर सार्थक सन्देश परक लघु रचना के लिए हार्दिक बधाई श्री हेमंड शर्मा जी   

Comment by Shyam Narain Verma on August 6, 2013 at 4:32pm
बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको!
Comment by Vasundhara pandey on August 6, 2013 at 2:02pm

अति सुन्दर रचना...!!

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