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मैं वाकिफ हूँ ,हकीकत से, ज़माने की 
इसे आदत, है चिढ़ने की,चिढ़ाने की ...

.
बहुत मुश्किल हुनर है ये , भला सब को 
कहाँ आती कला रिश्ते निभाने की ...

.
सज़ा क्या दूँ तुम्हें आखिर बताओ तो 
मेरी आँखों से नींदों को चुराने की ...

.
बयां इक शेर में, हो सकता है जब सब 
ज़रूरत क्या तुम्हें किस्सा सुनाने की ..

.
इसे महसूस करिएगा 'अजय' दिल से 
मुहब्बत शै नहीं दिखने दिखाने की...

मौलिक व अप्रकाशित ... अजय अज्ञात 

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Comment

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Comment by Ajay Agyat on April 9, 2014 at 7:31pm

सभी दोस्तों का धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 1:38pm

मतले ने ही आकर्षित किया. आगे के सभी अशार अपने हिसाब से बातें करते हैं. 

दिल से दाद कह रहा हूँ. 

आपने अग़र १२२२ १२२२ १२२२  भी चस्पां कर दिया होता तो नये प्रयासकर्ताओं को आपकी ग़ज़ल के मिसरों की तकनीक को समझने में बहुत कुछ सहुलियत हो सकती है.

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 2, 2013 at 2:50pm

आदरणीय सर जबरदस्त ग़ज़ल हुई है सभी शे'र लाजवाब बन पड़े हैं, इस शानदार ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by vandana on August 2, 2013 at 6:07am


बयां इक शेर में, हो सकता है जब सब 
ज़रूरत क्या तुम्हें किस्सा सुनाने की ..

सभी शेर बेह्तरीन 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 1, 2013 at 12:30pm

सज़ा क्या दूँ तुम्हें आखिर बताओ तो 
मेरी आँखों से नींeदों को चुराने की ...kamal ka sher ...saadar badhayee sweekarein

Comment by बसंत नेमा on August 1, 2013 at 10:50am

अअ0 अजय जी बहुत सुन्दर गजल सुन्दर भाव और सुन्दर प्रस्तुति ...बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on August 1, 2013 at 10:47am

//बयां इक शेर में, हो सकता है जब सब 
ज़रूरत क्या तुम्हें किस्सा सुनाने की //

वाह कमाल का शे'र है अजयजी,

इस ग़ज़ल केलिए दाद क़ुबूल फरमाएँ

कृपया ध्यान दे...

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