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चले चलो, बढे चलो...

चले चलो, बढे चलो...
------------------------
बढे चलो, बढे चलो
हिन्द के ओ सुरमाओ
बढे चलो, बढे चलो
सीमाओं की तुम ढाल हो,
रणभूमि की तुम नाल हो,
देश के द्वारपाल हो
माँ के तुम लाडले,
वतन के तुम कर्णधार हो,
बढे चलो बढे चलो
दुश्मन तुम्हे निहार रहा
ताक़त को है ललकार रहा
लहू को अपने उबाल के
जान अपनी वार के
धरती पर उसको मार के
बढे चलो बढे चलो.
-दिनेश सोलंकी

-फोटो महू छावनी के माल रोड का, छाया: दिनेश सोलंकी

[ मौलिक और अप्रकाशित ]


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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on May 29, 2013 at 8:26am

आदरणीय दिनेश जी सादर, सुन्दर देश प्रेम को बढ़ाती सिपाहियों का मान करती सुन्दर रचना देश प्रेम भाव पर सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 25, 2013 at 9:10pm

दुश्मन तुम्हे निहार रहा
ताक़त को है ललकार रहा
लहू को अपने उबाल के 
जान अपनी वार के 
धरती पर उसको मार के
बढे चलो बढे चलो. 

ओजस्वी रचना के लिए बधाई !

Comment by seema agrawal on May 23, 2013 at 7:32pm

देश के शूरवीर सिपाहियों को समर्पित इस भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई दिनेश जी 

Comment by Meena Pathak on May 23, 2013 at 6:41pm

बहुत सुन्दर रचना ....... बधाई आप को 

Comment by बृजेश नीरज on May 23, 2013 at 4:50pm

सुंदर चित्रण किया है इस चित्र का। बधाई आपको।

Comment by shalini rastogi on May 23, 2013 at 4:35pm

ओजस्वी कविता ... बहुत खूब दिनेश सोलंकी जी !

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