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ग़ज़ल - मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए !

ग़ज़ल -

ज़िन्दगी की दौड़ में आगे निकलने के लिए ,
आदमी मजबूर है खुद को बदलने के लिए ।

सिर्फ कहने के लिए अँगरेज़ भारत से गए ,
अब भी है अंग्रेजियत हमको मसलने के लिए ।

हाथ में आका के देकर नोट की सौ गड्डियां ,
आ गये संसद में कुछ बन्दर उछलने के लिए ।

गुम गयीं बापू तेरी मूल्यों की सारी टोपियाँ,
और लाठी रह गयी सच को कुचलने के लिए ।

नित गिरावट के बनाए जा रहे हैं कीर्तिमान 
सभ्यता की छातियों पर मूंग दलने के लिए ।

घर बुजुर्गों के बिना कितने वियाबां हो गए ,
अब नसीहत किस से पाएं हम संभलने के लिए ।

रात भर में फ़िक्र को उनकी न जाने क्या हुआ ,
सुब्ह हमसे आ मिले पाला बदलने के लिए ।

मुंगे मोती से भरे सागर में ऐसा क्या हुआ ?
मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए ।

आने वाली पीढ़ियों के नाम पौधे रोप दें ,
शुद्ध शीतल वायु तो हो साँस चलने के लिए ।

                                - अभिनव अरुण 
                                  [14052013]

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Comment by vijay nikore on June 19, 2013 at 3:32pm

इस बेमिसाल गज़ल के लिए बहुत सी बधाई, अभिनव भाई।

सादर,

विजय निकोर

Comment by avnish uniyal on June 18, 2013 at 3:02pm

gazal ki jitni bhi taareef kee jaye..kam hi padegi

Comment by mrs manjari pandey on June 18, 2013 at 12:51pm

मुंगे मोती से भरे सागर में ऐसा क्या हुआ ?

मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए

आदरणीय  अभिनव अरुण जी बहुत ही पैनी कलम चलाई है.  ढेरों शुभकामनायें  .

Comment by vijayashree on June 14, 2013 at 9:13pm

घर बुजुर्गों के बिना कितने वियाबां हो गए ,
अब नसीहत किस से पाएं हम संभलने के लिए

 

मुंगे मोती से भरे सागर में ऐसा क्या हुआ ?
मछलियाँ तय्यार हैं जारों में पलने के लिए

 

अति सुंदर /हार्दिक बधाई

Comment by aman kumar on June 13, 2013 at 1:33pm

रात भर में फ़िक्र को उनकी न जाने क्या हुआ ,
सुब्ह हमसे आ मिले पाला बदलने के लिए ।

आपको हार्दिक बधाई

Comment by Abhinav Arun on June 9, 2013 at 6:27pm

डॉ आशुतोष जी बहुत आभार आपका और साथ ही आबिद जी बहुत शुक्रिया आपका भी !!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 6, 2013 at 1:13pm

आपकी इस बेहतरीन ग़ज़ल पर आपको हार्दिक बधाई ..वर्तमान परिदृश को खूबसूरती से एक एक कड़ी जोड़ते हुए माला गूथने का यह शानदार प्रयास 

Comment by Abid ali mansoori on June 4, 2013 at 6:10pm
बेहतरीन पेशकश!
Comment by Abhinav Arun on June 3, 2013 at 9:03pm

 बहुत बहुत आभार आदरणीया वंदना जी !!

Comment by Vindu Babu on June 2, 2013 at 8:01pm
आने वाली पीढियों के नाम पौधे रोप दें
शुद्ध शीतल वायु तो हो सांस लेने के लिए।
अति सुन्दर आदरणीय।

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