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ग़ज़ल - मंडी से आढ़त तक सबकी पर्ची कटी हुई !

ग़ज़ल - 

कुछ होनी कुछ अनहोनी का मेला  ही तो है ,

ये जीवन क्या माटी का एक ढेला ही तो है ।

साँसों की झीनी चादर पर रिश्तों के गोटे ,

भीड़ में भी होकर  हर शख्स अकेला ही तो है ।

इस घर से उस घर तक जाने में रोना हँसना ,

सब कुछ गुड्डे गुड़ियों का एक खेला ही तो है ।

सुख दुःख का संगम तट ये तन और सारा जीवन ,

आशाओं  उम्मीदों का एक रेला ही तो है ।

सूली ऊपर सेज पिया की छूने को तत्पर ,

हर कबीर अपने उस पी का चेला ही तो है ।

बहर काफिया और रदीफ़ में उलझा उलझा सा ,

कहते जिसको शायर वो अलबेला ही तो है ।

मंडी से आढ़त तक सबकी पर्ची कटी हुई ,

देखो तो ये दुनिया भी एक ठेला ही तो है ।

                                       @ अरुण पाण्डेय "अभिनव"

                                                 [20052013 ]

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Comment by Abhinav Arun on May 28, 2013 at 1:25pm

बहुत शुक्रिया आदरणीय श्री अशोक जी , आपका स्नेह मिलता रहे यही कामना है !!

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 24, 2013 at 8:26am

आदरणीय अभिनव अरुण जी सादर बहुत सुन्दर गजल कही है सभी अशआर  दिल को छू रहे हैं.बहुत बहुत मुबारकबाद कुबुलें.सादर.

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:29am

आभार आदरणीय श्री राम शिरोमणि जी ,डॉ आशुतोष जी और श्री नीरज जी इस "निर्गुण " ने आपको पसंद आने की अनुभूति दी मेरा रचना धर्म तुष्ट हुआ आभार पुनः !

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:28am

आदरणीय श्री अरुण अनंत जी बहुत आभार आपका रचना पसंद कर आपने टिप्पणी दे उपकृत किया है \

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:27am

यदि है तो ,श्री  वीनस जी इस ' शानदार ' में आपकी ग़ज़ल सीरीज के लेखों और मार्गदर्शन का बड़ा योगदान है बहुत आभार । आज ज्ञान को बांटने का पुनीत कार्य करने वाले आप जैसे व्यक्ति है दुनिया कायम है :-) 

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:24am

। आदरणीया शालिनी जी तहे दिल से आभार आपका 

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:24am

श्री ब्रिजेश शेर सुन्दर लगे भाई जी बहुत धन्यवाद आपका 

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:23am

राजेश जी बहुत शुक्रिया आदरणीय आपका !

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:23am

श्री राज शर्मा जी ये शेर आपको भ| गया लिखना सार्थक हुआ आभार आपका !

Comment by Abhinav Arun on May 22, 2013 at 9:22am

आदरणीय श्री , मन में उठे भावो को शब्द देने की कोशिश हुई ..उतनी चमत्कृत करती हुई नहीं बन सकी .. फिर भी आपने आशीष दे अनुगृहित किया सादर नमन आपके स्नेह को !!

कृपया ध्यान दे...

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