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गुरु वंदन //छंद झूलना (प्रथम प्रयास) ...डॉ० प्राची

छंद झूलना 

(२६ मात्रा,  ७,७,७,५ पर यति , चार पद , अंत गुरु लघु )

गुरु ज्ञान दो, उत्थान दो, वंदन करो स्वीकार 

अनुभव प्रवण, उज्ज्वल वचन, हे ईश दो आधार 

तज काग तन, मन हंस बन, अनिरुद्ध ले विस्तार 

प्रभु के शरण, जीवन- मरण, पाता सहज उद्धार.....

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Comment by Dr.Ajay Khare on April 24, 2013 at 2:25pm

adarniya prachi ji gagar mai saagar aapne chand lino mai poori katha hi kah daali yahi to aapki vidushi hone ki pahchan hai badhaiu

Comment by अरुन 'अनन्त' on April 24, 2013 at 1:15pm

आदरणीया प्राची दीदी सादर बहुत ही सुन्दर मनोहारी छंद झूलना है दीदी इस झूले पर झूलने हेतु मेरा भी मन कर गया. आपके द्वारा  एक और छंद का ज्ञान मिला. आपकी यह प्रस्तुति मुझे बहुत पसंद आई मेरी ओर से हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Shyam Narain Verma on April 24, 2013 at 12:47pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ...................

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 24, 2013 at 9:27am

आदरणीया डा प्राची जी, झूलना छन्द मे रचित भजन पर बहुत ही बढ़िया प्रयास हुआ है, कथ्य और शिल्प पर भी बढ़िया काम हुआ है, एक जगह मुझे गेयता की समस्या लगी, देख लें |


ले लो शरण, जीवन- मरण, से प्रभु करो उद्धार...

...."से अब करो" यदि किया जाय तो !

बधाई इस अच्छी रचना पर |

Comment by manoj shukla on April 23, 2013 at 11:44pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें आदर्णीया

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