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अपना काम निकाल,भूल हमको वो जाता।
कहता उसको आम,बना जो भाग्य विधाता॥
मन पछताये खूब,बेल विष नेता बोया।
ठगे गये हम लोग,देख अपनापन खोया॥

हमको ले पहचान,वोट लेना जब होता।
सबसे दुआ-सलाम,कौल जमके वह करता॥
सुधरा चतुर सियार,लगे हर जन को गोया।
ठगे गये हम लोग,देख अपनापन खोया॥

जीता चतुर सियार,चाल अब बदली उसकी।
भूला सारे कौल,हौल अब मन में उठती॥
टूटे सारे ख्वाब,हृदय विह्वल हो रोया।
ठगे गये हम लोग,देख अपनापन खोया॥

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 1, 2013 at 9:55pm

विंध्येश्वरी त्रिपाठी जी बहुत बढ़िया रोला गीत ,हार्दिक बधाई आपको |

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 1, 2013 at 8:43pm
आदरणीय रविकर जी!
रचना की सराहना एवं उत्साहवर्द्धन के लिये आपका बहुत-बहुत आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 1, 2013 at 8:42pm
आदरणीया प्राची दीदी!अनुज के रचना की सराहना एवं उत्साहवर्द्धन के लिये आपका बहुत-बहुत आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 1, 2013 at 8:41pm
पूज्य गुरुदेव श्री सौरभ पाण्डेय जी सादर चरणस्पर्श!
रचना की सराहना एवं उत्साहवर्द्धन के लिये आपका बहुत-बहुत आभार।
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 1, 2013 at 8:38pm
आ. राम शिरोमणि पाठक जी,
आ. श्याम वर्मा जी,
आ. पवन अम्बा जी,
आ. मंजरी जी,
आ. राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
रचना की सराहना एवं उत्साहवर्द्धन हेतु हार्दिक आभार
Comment by रविकर on March 1, 2013 at 5:21pm

बहुत बढ़िया आदरणीय |
सुन्दर पूर्ति-


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 1, 2013 at 4:31pm

बहुत प्यारा छंदबद्ध रोलागीत 

ठगे गये हम लोग,देख अपनापन खोया॥..वाह 

हार्दिक बधाई विन्ध्येश्वरी जी 

Comment by राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' on March 1, 2013 at 2:21pm

त्रिपाठी जी गीत मन को भा गया 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 1, 2013 at 2:20pm

ठगे गये हम लोग,देख अपनापन खोया..     विंध्येश्वरीजी इस छंदबद्ध रचना के लिए बहुत बहुत बधाई.. . 

Comment by mrs manjari pandey on March 1, 2013 at 12:51pm

आदरणीय वीनस जी ग़ज़ल की सराहना कर के मेरा उत्साहवर्धन करने के लिए हार्दिक आभार।

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