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कच्चे रास्ते में, रास्ता होने की,

असली खुश्बू होती है।

वह चलता है और चलाता है

उसमें खुद को बदलने की हिम्मत है

वह कभी अहम नहीं करता।

वह बरसात की खुशबू को,

सुंदरता को,अच्छी तरह से परख़ता,

पहचानता है।

क्योंकि वह बरसात को सीने से लगा लेता है

वह आस-पास के पेड-पौधों से नहीं शर्माता।

उसे पता है कि शर्म उसकी खुशियों को रोकती है

उसे यह भी पता है

कि यह काम लोगों का है उसका नहीं।

वह अपने तन को धूल बनाकर

हवा के साथ हंसता हुआ उडा देता है

वह गीता के आत्म ज्ञान को कहता नहीं, भोगता है।

वह पक्का होना नहीं चाहता

वह आदमी से प्यार तो करता है

लेकिन उसे हमेशा यही डर सताता है

कंही वह उसे पक्का न कर दे।।

...........................सूबे सिंह सुजान...........

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Comment by राजेश 'मृदु' on February 26, 2013 at 11:12am

बेहद सुन्‍दर रचना है, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 25, 2013 at 10:39pm

सरल सीधे शब्दों में कितनी गूढ़ बात को आपने साझा किया है ! वाह !

गाँव के कच्चे रास्तों और पगडंडियों के प्रति मन और नत हो गया. हार्दिक बधाई स्वीकारें भाईजी.

शुभेच्छाएँ

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 25, 2013 at 8:17pm

वाह वाह क्याबात है ...............सहज और सरल अभिव्यक्ति के लिए बधाई

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 25, 2013 at 6:30pm

वह गीता के आत्म ज्ञान को कहता नहीं, भोगता है।

वह पक्का होना नहीं चाहता

वह आदमी से प्यार तो करता है

लेकिन उसे हमेशा यही डर सताता है

कंही वह उसे पक्का न कर दे।। - बहुत सुन्दर भाव अभिव्यक्त हुए है, हार्दिक बधाई स्वीकारे श्री सूबे सिंह सुजान जी 
Comment by Vindu Babu on February 25, 2013 at 5:34pm
सादर अभिनन्दन सुजान जी!
साधारण विन्दु में इतने गहन विचारों की खोज और सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए आपको बधाई.
Comment by बृजेश नीरज on February 25, 2013 at 5:18pm

सुजान जी बहुत सुन्दर ढंग से बुनियादी बात उकेरी है आपने। बहुत बधाई।

Comment by सूबे सिंह सुजान on February 25, 2013 at 4:26pm

प्राची जी, सच कहूँ तो ......यह मेरा रास्ता है मैं आज भी इसी कच्चे रास्ते से आता जाता हूँ।।अभी कंई दिनों से बरसात चल रही थी........यह कविता बरसात में कच्चे रास्ते से जाते हुये बनी।।

Comment by सूबे सिंह सुजान on February 25, 2013 at 4:24pm

विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी...........जी आपका शुक्रिया..........यह हव....नहीं था गलती टंकण है...........वह लिखा था


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2013 at 3:37pm

भाव जैसे बह चले.... कच्चे रास्ते की विशिष्टता और उसके डर को आपकी अभिव्यक्ति के साथ साथ समझना अच्छा लगा... टंकण त्रुटियाँ एक दो जगह हैं, उन्हें सुधार लें.

बधाई इस रचना पर.

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 25, 2013 at 11:34am
आदरणीय सुजान जी!बहुत ही सुन्दर कविता है।भावों की उन्मुक्त उड़ान है।यह //हव// कुछ समझ में नहीं आया।

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