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जिंदगी इतने गम क्यूँ देती है ?

ज़िन्दगी इतने गम क्यूँ देती है

गम के संग आंसू भी देती है

आंसुओं संग दर्द भी देती है

दर्द के संग तनहाइयाँ भी देती है

तनहाइयों संग फिर रुस्वाइयाँ भी देती है ……

फिर भी हर किसी को जीने की ही चाह होगी

हर पल हर किसी को जीवन की ही प्यास होगी

हसीन सपनो और खवाबो की ही बारात होगी

नित नयी उमंगों और आशाओं की बरसात होगी

लेकिन होगा वही जो ज़िन्दगी की बिसात होगी ……….

फिर मौत आएगी हमें गले लगाएगी

हर दुःख से साथ छुटाएगी

जीवन के बंधनों से मुक्त कराएगी

जीवन का अंतिम सफ़र कराएगी

फिर भी हमारी दुश्मन कहलाएगी ………

  • प्रवीन मलिक

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by Parveen Malik on February 20, 2013 at 8:49am

धन्यवाद अभिनव अरुण जी रचना को समय देने के लिए ...

Comment by Abhinav Arun on February 18, 2013 at 6:33pm
रचना अनुभूतियों के सागर में चमकते मोती सद्रृश है इन गहरे भावों की पारखी प्रवीना जी को बधाई
Comment by Parveen Malik on February 18, 2013 at 12:15pm

आदरणीय संजीव वर्मा जी ... अगर जिंदगी सिर्फ सुखों और खुशियों का गीत हो तो उसमे नीरसता आ जाएगी .. 

जीवन है तो मौत भी निश्चित है 

आज सुख है तो कल दुःख भी निश्चित है ..

सादर धन्यवाद...

Comment by Parveen Malik on February 18, 2013 at 12:12pm

आदरणीय अशोक जी नमस्कार,

जैसा की आप जानते हैं जिस पल जो भाव दिल में आये उनको रचना में उतार दिया ... व्यक्तिगत टूर से रचना का कोई लेना देना नहीं 

सादर धन्यवाद....

Comment by Parveen Malik on February 18, 2013 at 12:11pm

तुषार जी रचना को समय देने के लिए हार्दिक धन्यवाद ...

Comment by Parveen Malik on February 18, 2013 at 12:09pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सादर ,

काव्यात्मक अभिव्यक्ति की दौड़ में कोशिश जारी  है बस आप लोग आशीर्वाद देते रहे .. धन्यवाद...

Comment by Parveen Malik on February 18, 2013 at 12:07pm

प्राची जी नमस्कार ,

जिंदगी में बहुत से ऐसे प्रशन हैं जिनका कभी कोई उत्तर नहीं मिलता .......

जिंदगी खुशियाँ भी देती है ..

जिंदगी गम भी देती है ...

बस ऐसे ही कुछ भाव दिल में आये तो रचना में उतार दिए .. धन्यवाद...

Comment by sanjiv verma 'salil' on February 18, 2013 at 10:14am

है प्रवीण वह जो जिए दुःख में भी हँस मीत.
करे दर्द से मौन हो जो आजीवन प्रीत..
जन्म-मौत का संग है श्वास-आस सम जान-
धूप-छाँव के गीत गा जीवन हो रस-खान..

Comment by Ashok Kumar Raktale on February 18, 2013 at 8:53am

आदरणीया प्रवीण जी हताशा के चरम पर ले जाती सुन्दर रचना मगर जीवन में ऐसी निराशा का होना कमजोरी का प्रतीक है.सादर.

Comment by Tushar Raj Rastogi on February 17, 2013 at 8:49pm

जिंदगी को बयां करती बहुत मार्मिक रचना | बधाई

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