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ग़ज़ल - आप खुश हैं कि तिलमिलाए हम

एक और ताज़ा गज़ल आपकी खिदमत में पेश करता हूँ... लुत्फ़ लें ...

आप खुश हैं, कि तिलमिलाए हम |
आपके कुछ तो काम आए हम |

खुद गलत, आपको ही माना सहीह,
जाने क्यों आपको न भाए हम |

आपके फैसले गलत कब थे,
और फिर, सब सगे, पराए हम |

दोस्तों ने भी कुछ कमी न रखी,
और खुद के भी हैं सताए हम |

हम पे इल्ज़ाम था मुहब्बत का,
पर खड़े क्यों थे सर झुकाए हम |

इल्मो-फन का लगा है इक बाज़ार,
लौटते हैं लुटे लुटाए हम |

शामियाने सी फितरतें अपनी,
उम्र भर धूप में नहाए हम |

नाम कम है, जियादा हैं बदनाम,
शाइरी तुझसे बाज़ आए हम |

पसे-आईना कोई है 'वीनस',
जिसको अब तक समझ न पाए हम |

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on February 16, 2013 at 8:14am

बहुत खूब श्री वीनस जी ! हर शेर बोल रहा है । 

 
शामियाने सी फितरतें अपनी,
उम्र भर धूप में नहाए हम |

नाम कम है, जियादा हैं बदनाम,
शाइरी तुझसे बाज़ आए हम |
 शामियाने के क्या कहने दिल लूट लिया हार्दिक बधाई !!
Comment by मोहन बेगोवाल on February 15, 2013 at 10:55pm

वीनस जी , 

आप का गज़ल कहने का अंदाज लाजवाब है, मुझे ये शेर बहुत अच्छा लगा 

शामियाने सी फितरतें अपनी,
उम्र भर धूप में नहाए हम |

Comment by विवेक मिश्र on February 7, 2013 at 8:52pm

क्या खूब ही गुफ्तगू करता हुआ मतला है.. वाह..
और फिर इस शे'र पर, कि-
/नाम कम है, जियादा हैं बदनाम,
शाइरी तुझसे बाज़ आए हम /

मैं तो यही कहूँगा कि, "जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है..$". ढेरों दाद कबूलें.
जय हो..!!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 6, 2013 at 9:10pm

क्या कहूँ .. कुछ समझ में नहीं आ रहा है. सही है, उदास एक और रंग है. किन्तु, आपके ग़ज़लकार को कभी इस रूप में नहीं देखा था.

आप खुश हैं, कि तिलमिलाए हम |
आपके कुछ तो काम आए हम |.. . . हुम्म .. .

इतना...... ??!!!!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 6, 2013 at 7:09pm

जय हो

इक इक अशआर ग़ज़ब ढा रहा है
कह रहा है ये है ग़ज़ल ये है ग़ज़ल
इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद क़ुबूल कीजिये साहब

Comment by रविकर on February 6, 2013 at 5:59pm

आभार आदरणीय |
आनंदित हुआ ||

Comment by राजेश 'मृदु' on February 6, 2013 at 2:00pm

शामियाने सी फितरतें अपनी,
उम्र भर धूप में नहाए हम |

क्‍या बात है वीनस जी, आपकी गजल पढ़ना किसी पुरस्‍कार से कम नहीं, सादर


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 6, 2013 at 1:32pm

ग़ज़ल अच्छी कही है वीनस भाई,

शामियाने सी फितरतें अपनी,
उम्र भर धूप में नहाए हम |

क्या कहने भाई, शेर दिल तक उतर रहा है,

//खुद गलत, आपको ही माना सहीह,//
जरा बताइयेगा वीनस भाई |

एक खुबसूरत ग़ज़ल पर ढेरों दाद स्वीकार कीजिये |

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on February 6, 2013 at 10:55am

दोस्तों ने भी कुछ कमी न रखी,
और खुद के भी हैं सताए हम -- वाह भाई.. इसे कहते हैं अंदाज़े बयां..

शामियाने सी फितरतें अपनी,
उम्र भर धूप में नहाए हम -- ग़ज़ब की कहन...

एक के बाद एक शानदार ग़ज़लों से मन मोह रहे हैं आप! दिली मुबारकबाद है आपके लिए..

Comment by विजय मिश्र on February 6, 2013 at 10:21am

" शामियाने सी फितरतें अपनी,
        उम्र भर धूप में नहाए हम |"

 वीनसजी !

दायित्वधारीयों के जीवन पर एक सुन्दर बिम्ब प्रस्तुत करता हैं और सच है कि ऐसे लोग खुद के भी निगेह्वान होते हैं जमाने के साथ-साथ . पूरे नज्म में एक खास लोच है . खूबसूरत है . 

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