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कोरा कागज़
अगर तू चाहती तो कभी भी
कोरे कागज़ पर मुझको
अँगूठा लगाने को कह सकती थी
और जानती हो, मैं..
मैं ‘न’ न कहता ।

उस कोरे कागज़ पर फिर
तुम कुछ भी लिख सकती थी।


तुमने मेरे नाम पर मुझसे
अधिकार माँगा
मैंने वह आँखें मूँद के दे दिया,
पर जब "तुम्हारे" अपने नाम पर तुमने
मुझसे अधिकार माँगा,
मेरे ओंठों पर हर पल नाम तुम्हारा था,
अत: यह अधिकार मैं तुम्हें दे न सका ।


मेरे धुँधँले-धुँधले सुलगते वजूद ने
नीदों में मेरी तुम्हारा नाम सुना,
सपनों ने सपनों में तुम्हें कई बार बुलाया ।


दर्द भरे अन्धेरों में मैंने
तुम्हें भुलाने के प्रबल प्रयास में,
नींदों के कान बंद कर दिए,
सपनों के ओंठ भी सी दिए,
पर जीते-जागते ख़यालों के गुबार
प्रतिदिन प्रतिरात
तुम्हें सुनते रहे, बुलाते रहे
कि जैसे पल भर को भी भुला न सके ।


तुम तो शूरू से ही शायद
मेरी इस कोमल कमज़ोरी से वाकिफ़ थी,
तभी तो कोरे कागज़ पर तुमने उस दिन
मेरा अँगूठा नहीं माँगा था ।


विजय निकोर
vijay2@comcast.net
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 30, 2013 at 7:51pm

धन्यवाद नहीं आशीर्वाद दिया कीजिये सर जी ....जय हो

Comment by vijay nikore on January 30, 2013 at 7:37pm

आदरणीय संदीप जी,

अतिशय धन्यवाद।

विजय निकोर

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 30, 2013 at 6:36pm

बहुत खूब सर जी ..............क्या भाव पिरोये हैं आपने वाह

Comment by vijay nikore on January 30, 2013 at 4:37pm

आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी:

कविता का सुन्दर विश्लेषण करके सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।

आपकी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया मुझे और लिखने को प्रेरित करती है।

सादर,

विजय निकोर

Comment by vijay nikore on January 30, 2013 at 4:34pm

आदरणीय राजेश कुमार जी:

आपने ठीक कहा "मेरा-तेरा का भाव नहीं रहता"

और हमारा मन अपने से पहले दूसरे का हित सोचता है।

सराहना के लिए अतिशय धन्यवाद।

सादर,

विजय निकोर

Comment by राजेश 'मृदु' on January 30, 2013 at 12:59pm

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति । पूर्णता जब अपनी पराकाष्‍ठा पर हो तो अक्‍सर यही होता है, मेरा-तेरा का भाव नहीं रहता, सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 30, 2013 at 11:33am
तुमने मेरे नाम पर मुझसे
अधिकार माँगा
मैंने वह आँखें मूँद के दे दिया,----------------   ठीक है कोमल ह्रदय जो है 
पर जब "तुम्हारे" अपने नाम पर तुमने
मुझसे अधिकार माँगा,
मेरे ओंठों पर हर पल नाम तुम्हारा था,
अत: यह अधिकार मैं तुम्हें दे न सका ।-----  अतिशय प्यार के कारण 

तुम तो शूरू से ही शायद
मेरी इस कोमल कमज़ोरी से वाकिफ़ थी,
तभी तो कोरे कागज़ पर तुमने उस दिन
मेरा अँगूठा नहीं माँगा था ।                 ------   अटूट विश्वास हो तो यही होता है 

बहुत खूब, सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई भाई श्री विजय निकोरे जी

 

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