For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ग़ज़ल"जिसे देखा नहीं हमने उसे भगवान बोलेंगे

===========ग़ज़ल=============
बहर-ए-हजज मुसम्मन सालिम 
वजन- 1222 / 1222 / 1222 / 1222 

गरीबों का दमन करके जो सीना तान बोलेंगे 
झुकाए सर उन्ही को आप तुर्रम खान बोलेंगे 

सिपाही काठ के पुतले बने फिरते हैं राहों में 
कसम खाई वो करने जो सियासतदान बोलेंगे 

अगर वो हाथ में झाडू लिए घर में खडा हो तो 
खबर वो छाप कर अखबार में श्रमदान बोलेंगे 

दरो-दीवार क्या जाने बुझा क्यूँ दीप ये घर का 
हवाओं की हकीकत तो ये रोशनदान बोलेंगे 

समझ आता नहीं यारो जो जाँ ही ले गया अपनी
उसे हम जान बोलेंगे या फिर हैवान बोलेंगे 

बड़ी मसरूफ है दुनिया महज इक चोट खाने पर 
नहीं सोचा था सपने में के अब बेजान बोलेंगे 

अजब दस्तूर दुनिया का मुझे ये "दीप" लगता है 
जिसे देखा नहीं हमने उसे भगवान बोलेंगे 

संदीप पटेल "दीप"

Views: 519

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Tilak Raj Kapoor on January 15, 2013 at 9:43pm

अगर वो हाथ में झाडू लिए घर में खडा हो तो 
खबर वो छाप कर अखबार में श्रमदान बोलेंगे 

अच्‍छा कटाक्ष है भाई। 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 13, 2013 at 9:53am

आदरणीय प्रदीप सर , आदरणीय विजय सर , आदरणीया शुभ्रा जी , आदरणीय अनंत भाई , आदरणीय गणेश सर जी, आदरणीय सतीश सर जी , सादर प्रणाम
आप सभी ने ग़ज़ल को सराहा और मेरे लेखन को मान दिया इसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूँ
स्नेह यूँ ही बनाये रखिये


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 12, 2013 at 9:02pm

संदीप जी, बहुत ही प्यारी ग़ज़ल, सभी अशआर खुबसूरत हैं, बधाई स्वीकार करें |

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 12, 2013 at 11:31am

गरीबों का दमन करके जो सीना तान बोलेंगे 
झुकाए सर उन्ही को आप तुर्रम खान बोलेंगे ... हकीकत .. सुन्दर

सिपाही काठ के पुतले बने फिरते हैं राहों में 
कसम खाई वो करने जो सियासतदान बोलेंगे ... वाह मित्रवर वाह

अगर वो हाथ में झाडू लिए घर में खडा हो तो 
खबर वो छाप कर अखबार में श्रमदान बोलेंगे ... क्या बात है

दरो-दीवार क्या जाने बुझा क्यूँ दीप ये घर का 
हवाओं की हकीकत तो ये रोशनदान बोलेंगे .... लाजवाब

समझ आता नहीं यारो जो जाँ ही ले गया अपनी
उसे हम जान बोलेंगे या फिर हैवान बोलेंगे ..... वाह सुन्दर

बड़ी मसरूफ है दुनिया महज इक चोट खाने पर 
नहीं सोचा था सपने में के अब बेजान बोलेंगे ... मस्त मदमस्त

अजब दस्तूर दुनिया का मुझे ये "दीप" लगता है 
जिसे देखा नहीं हमने उसे भगवान बोलेंगे ... गज़ब ग़ज़ल में सब.

बंधुवर मित्रवर ज़माने के रंग रूप का इतनी शालीनता के साथ ग़ज़ल में बयां किया है, पढ़के दिल बाग़-बाग़ हो गया मित्र मजा आ गया, महफ़िल लूट ली आपने हार्दिक बधाई दिली दाद कुबूलें. सादर

Comment by satish mapatpuri on January 12, 2013 at 2:39am

दरो-दीवार क्या जाने बुझा क्यूँ दीप ये घर का
हवाओं की हकीकत तो ये रोशनदान बोलेंगे

बहुत खूब संदीप जी ... बहुत खूब . बेहतरीन पेशकश ... दाद कुबूल फरमाएं

Comment by shubhra sharma on January 11, 2013 at 9:08pm

जिसे देखा नहीं हमने उसे भगवान बोलेंगे,

पटेल  जी  सुन्दर रचना 
......................शुभ्रा 
Comment by vijay nikore on January 11, 2013 at 7:27pm

बहुत अच्छे।

बधाई।

विजय निकोर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 11, 2013 at 4:01pm

बहुत खूब सूरत बयानी की है 

बधाई, आदरणीय संदीप जी, सादर 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
12 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीया रिचा यादव जी नमस्कार बहुत शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई का "
12 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"क्या गिला गर किसी को भूल गया इश्क़ में जो ख़ुदी को भूल गया अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात…"
13 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक राज कपूर जी नमस्कार बहुत- बहुत धन्यवाद आपका आपने समय निकाला ग़ज़ल तक आए और ऐसी बेहतरीन…"
13 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय अजय गुप्ता 'अजेय' जी नमस्कार बहुत धन्यवाद आपका आपने समय दिया आपने सहीह फ़रमाया गुणी…"
13 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक…"
13 hours ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"अम्न का ख़्वाब देखा तो था पर क्या करुँ रात ही को भूल गया "
13 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"इस सुझाव को विशेष रूप से रूहानी नज़रिये से भी देखेंहुस्न मुझ पर सवार होने सेशेष सारी कमी को भूल…"
15 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आ. भाई दयाराम जी, अभिवादन व आभार।"
17 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"हार्दिक आभार आदरणीय "
18 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय दयाराम जी नमस्कार  बहुत शुक्रिया आपका  सादर "
19 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-188
"आदरणीय तिलक जी सादर अभिवादन  बहुत बहुत धन्यवाद आपका  बहुत अच्छे सुझाव हैं ग़ज़लमें निखार…"
19 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service