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"ग़ज़ल"जिसे देखा नहीं हमने उसे भगवान बोलेंगे

===========ग़ज़ल=============
बहर-ए-हजज मुसम्मन सालिम 
वजन- 1222 / 1222 / 1222 / 1222 

गरीबों का दमन करके जो सीना तान बोलेंगे 
झुकाए सर उन्ही को आप तुर्रम खान बोलेंगे 

सिपाही काठ के पुतले बने फिरते हैं राहों में 
कसम खाई वो करने जो सियासतदान बोलेंगे 

अगर वो हाथ में झाडू लिए घर में खडा हो तो 
खबर वो छाप कर अखबार में श्रमदान बोलेंगे 

दरो-दीवार क्या जाने बुझा क्यूँ दीप ये घर का 
हवाओं की हकीकत तो ये रोशनदान बोलेंगे 

समझ आता नहीं यारो जो जाँ ही ले गया अपनी
उसे हम जान बोलेंगे या फिर हैवान बोलेंगे 

बड़ी मसरूफ है दुनिया महज इक चोट खाने पर 
नहीं सोचा था सपने में के अब बेजान बोलेंगे 

अजब दस्तूर दुनिया का मुझे ये "दीप" लगता है 
जिसे देखा नहीं हमने उसे भगवान बोलेंगे 

संदीप पटेल "दीप"

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on January 15, 2013 at 9:43pm

अगर वो हाथ में झाडू लिए घर में खडा हो तो 
खबर वो छाप कर अखबार में श्रमदान बोलेंगे 

अच्‍छा कटाक्ष है भाई। 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on January 13, 2013 at 9:53am

आदरणीय प्रदीप सर , आदरणीय विजय सर , आदरणीया शुभ्रा जी , आदरणीय अनंत भाई , आदरणीय गणेश सर जी, आदरणीय सतीश सर जी , सादर प्रणाम
आप सभी ने ग़ज़ल को सराहा और मेरे लेखन को मान दिया इसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूँ
स्नेह यूँ ही बनाये रखिये


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 12, 2013 at 9:02pm

संदीप जी, बहुत ही प्यारी ग़ज़ल, सभी अशआर खुबसूरत हैं, बधाई स्वीकार करें |

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 12, 2013 at 11:31am

गरीबों का दमन करके जो सीना तान बोलेंगे 
झुकाए सर उन्ही को आप तुर्रम खान बोलेंगे ... हकीकत .. सुन्दर

सिपाही काठ के पुतले बने फिरते हैं राहों में 
कसम खाई वो करने जो सियासतदान बोलेंगे ... वाह मित्रवर वाह

अगर वो हाथ में झाडू लिए घर में खडा हो तो 
खबर वो छाप कर अखबार में श्रमदान बोलेंगे ... क्या बात है

दरो-दीवार क्या जाने बुझा क्यूँ दीप ये घर का 
हवाओं की हकीकत तो ये रोशनदान बोलेंगे .... लाजवाब

समझ आता नहीं यारो जो जाँ ही ले गया अपनी
उसे हम जान बोलेंगे या फिर हैवान बोलेंगे ..... वाह सुन्दर

बड़ी मसरूफ है दुनिया महज इक चोट खाने पर 
नहीं सोचा था सपने में के अब बेजान बोलेंगे ... मस्त मदमस्त

अजब दस्तूर दुनिया का मुझे ये "दीप" लगता है 
जिसे देखा नहीं हमने उसे भगवान बोलेंगे ... गज़ब ग़ज़ल में सब.

बंधुवर मित्रवर ज़माने के रंग रूप का इतनी शालीनता के साथ ग़ज़ल में बयां किया है, पढ़के दिल बाग़-बाग़ हो गया मित्र मजा आ गया, महफ़िल लूट ली आपने हार्दिक बधाई दिली दाद कुबूलें. सादर

Comment by satish mapatpuri on January 12, 2013 at 2:39am

दरो-दीवार क्या जाने बुझा क्यूँ दीप ये घर का
हवाओं की हकीकत तो ये रोशनदान बोलेंगे

बहुत खूब संदीप जी ... बहुत खूब . बेहतरीन पेशकश ... दाद कुबूल फरमाएं

Comment by shubhra sharma on January 11, 2013 at 9:08pm

जिसे देखा नहीं हमने उसे भगवान बोलेंगे,

पटेल  जी  सुन्दर रचना 
......................शुभ्रा 
Comment by vijay nikore on January 11, 2013 at 7:27pm

बहुत अच्छे।

बधाई।

विजय निकोर

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 11, 2013 at 4:01pm

बहुत खूब सूरत बयानी की है 

बधाई, आदरणीय संदीप जी, सादर 

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