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धरती माँ ही पालती, रख नारी का मान,
यही रहेगी संपदा, कर नारी के नाम ।

बहती नदी सी नारी, दूजे घर को जाय,
अपनावे ता उम्र ही, घर उसका हो जाय ।

ममता भाव की भूखी, केवल चाहे मान,
रुखी सूखी पाय भी, घर की रखती शान ।

झेल रही है बेटियाँ, अपना सब अपमान,
बाँध टूटता सब्र का, तुझे न इसका भान ।

नारी का सम्मान करे, तब घर का तू नाथ,
दूजे घर को छोड़ कर, पकड़ा तेरा हाथ ।

लड़के की ही चाह में, सहन किया है पाप,
भ्रूण हत्या पाप करे, झेले फिर संताप |

झेल चुकी है बेटियाँ,बड़े बड़े अपमान,
लड़के अब कुंवारे फिरे, नहीं रहे अरमान ।

बेटी अपने जहन में, यह भी रखती ध्यान,
बिना नम्रता के यहाँ, किसको मिलता मान ।

बेटी मेरी बात को,रख जीवन भर याद,
तेरे काँधे ही टिकी, इस घर की बुनियाद ।

बेटी मेरी बात तू,यह भी रखना याद,
बिना नम्रता के यहाँ,जीवन है बर्बाद ।

बेटा बेटी देन है, इश्वर की सौगात,
मुख इनसे क्यों मोड़ते,एक ही इनके तात ।

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 17, 2012 at 9:34am

दोहे पसंदकर हॉंसला बढ़ाने के लिएहार्दिक आभार श्री अशोक रक्ताले साहिब

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 17, 2012 at 9:25am

आदरणीय लड़ीवाला साहब

                                सादर, बहुत सुन्दर भाव प्रकट करते या कहूँ जग को जाग्रत करते दोहों पर बधाई स्वीकारें.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 12, 2012 at 1:33pm

दोहे लिखने का मकसद तो समाज को जागरूक करना और आगाह करना होता है । कबीर, रहीम,बिहारी आदि कवियो के दोहे समाज को जागरूक करने के ही निम्मित है । दोहे सारगर्भित बन पड़े यह सौभाग्य की बात है । आपका हार्दिक आभार आदरणीया महिमा श्री जी  

Comment by MAHIMA SHREE on December 11, 2012 at 9:52pm

आदरणीय लक्ष्मण सर , सादर नमस्कार

बहुत ही सारगर्भित दोहें .. समाज को चेतावनी तो दे ही रही है आपकी रचना, साथ ही  बेटियों के दुखी मन का चित्रण भी बहुत ही सच्चाई के साथ बयाँ कर रही है /

आपको बहुत -2 बधाई और साधुवाद /

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 11, 2012 at 9:09pm

रचना सराहने के लिए हार्दिक आभार आपका श्री राजेश कुमार झा जी

Comment by राजेश 'मृदु' on December 11, 2012 at 6:37pm

आपकी रचना बहुत सुंदर संदेश देती है समाज को भी और बेटी को भी खास तौर से ये पंक्तियां

बेटी मेरी बात को,रख जीवन भर याद,
तेरे काँधे ही टिकी, इस घर की बुनियाद ।

बड़ी सहजता से लिखी गई हैं, बहुत बधाई

 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 11, 2012 at 6:03pm

आदरणीय श्री प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा जी, रचना सराह्कर दोहों के प्रति होंसला बढाने हेतु आपका हार्दिक आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 11, 2012 at 4:26pm

आदरणीय लड़ीवाला जी, 

सादर अभिवादन 

बहुत सुन्दर भाव युक्त अभिव्यक्ति हेतु बधाई 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 11, 2012 at 11:07am

रचना पसंद करने के लिए हार्दिक आभार विजय मिश्र जी

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 11, 2012 at 11:06am

रचना पसंद करने के लिए हार्दिक आभार डॉ अजय खरे जी 

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