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अपमानों के अंधड़ झेले ; छल तूफानों से टकराए

अपमानों के अंधड़ झेले ;
छल तूफानों से टकराए ,
कंटक पथ पर चले नग्न पग
तब हासिल हम कुछ कर पाए !

आरोपों की कड़ी धूप में
खड़े रहे हम नंगे सिर ,
लगी झुलसने आस त्वचा थी
किंचित न पर हम घबराये !

व्यंग्य-छुरी दिल को चुभती थी ;
चुप रहकर सह जाते थे ,
रो लेते थे सबसे छिपकर ;
सच्ची बात तुम्हे बतलाएं !

कई चेहरों से हटे मखौटे ;
मुश्किल वक्त में साथ जो छोड़ा ,
नए मिले कई हमें हितैषी
जो जीवन में खुशियाँ लाये !



धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ;
यही सबक हमने है सीखा ;
जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला
नव कोंपल उन पर ही आये !
शिखा कौशिक 'नूतन'

[ मेरी शोध यात्रा के पड़ावों को इस भावाभिव्यक्ति के माध्यम से उकेरने का एक सच्चा प्रयास मात्र है ये ]

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on November 23, 2012 at 10:11pm

शोध यात्रा के अनगिन पढ़ावों को आपने मुझे भी याद दिला दिया.... कितने उतार चढ़ाव आते है इस यात्रा में, कभी तो मन बिलकुल हार जाता है, तो कभी एक दिव्य ऊर्जा नया जोश भर देती है, 

लेकिन एक बात है, मंजिल मिल जाने के बाद लगता है...सफ़र कितनी सीखों भरा था, और सफ़र के प्रति नज़रिया भी बदल जाता है.

एक एक शब्द इस रचना का ह्रदय को संवेदित कर रहा है. आदरणीय सौरभ जी की बात से मैं भी सहमत हूँ, आप नवगीत विधा को आत्मसात करें तो निस्संदेह अद्भुत गीत लिख सकेंगी . 

हार्दिक बधाई शोध यात्रा के विविध अनुभवों के सार को मंच पर हम सबके साथ साँझा करने के लिए.

Comment by shikha kaushik on November 23, 2012 at 1:46pm

संभवतः मैं स्पष्ट कर पाया.---निस्संदेह .धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 23, 2012 at 1:34pm

कष्ट तो शिखा जी आपको ही करना है. इस मंच पर अब कतिपय विधाओं से संबंधित बहुत कुछ पोस्ट हो चुका है. दूसरे, मंच के आयोजनों में मात्र प्रविष्टियाँ नहीं आती, बल्कि रचनाओं और विधाओं पर विशद चर्चाएँ भी होती रहती हैं जिसके माध्यम से वार्तालाप/संवाद क्रम में समीचीन जानकारियाँ साझा होती रहती हैं. आग्रह है, आप उनका अनुसरण करें. अन्य रचनाकारों की रचनाएँ पढ़ें और खु्ली प्रतिक्रिया दें.  सब कुछ सहज होता जायेगा.

संभवतः मैं स्पष्ट कर पाया.

Comment by shikha kaushik on November 23, 2012 at 1:19pm

सौरभ जी उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार .नवगीतात्मक रचनाओं के सृजन के सम्बन्ध में विस्तार से मार्गदर्शन करने का कष्ट करें .सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 23, 2012 at 1:09pm

व्यंग्य-छुरी दिल को चुभती थी ;
चुप रहकर सह जाते थे ,
रो लेते थे सबसे छिपकर ;
सच्ची बात तुम्हे बतलाएं !

अभिव्यक्ति की सचाई पर हार्दिक धन्यवाद, शिखाजी. एक अनुरोध अवश्य करूँगा, आपकी भाषाई प्रवाह उच्च स्तर का है. आप हिन्दी नवगीतात्मक रचनाओं पर प्रयास करें. आपका संप्रेषण विधाओं की कसौटी पर भी मान्य होगा. यह हम सभी के लिये अत्यंत संतोष की बात होगी.

हार्दिक शुभेच्छाएँ.

Comment by shikha kaushik on November 22, 2012 at 10:53pm

अखिलेश जी ,शालिनी जी व् राजेश जी -आप सभी का हार्दिक आभार उत्साहवर्धन हेतु .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 22, 2012 at 6:01pm

वाह शिखा कौशिक जी बहुत अच्छी  प्रवाह मई शिक्षाप्रद कविता  लिखी है बहुत पसंद आई विशेष कर ये पंक्तियाँ तो दिल में घर बनाती हुई हैं ---धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ;
यही सबक हमने है सीखा ;
जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला
नव कोंपल उन पर ही आये !

Comment by shalini kaushik on November 22, 2012 at 3:03pm

bahut sundar bhavabhivyakti .sangharshon me hi sahas kee sachchi pariksha hoti hai aur aap ne sangharsh jhelkar safalta hasil kee hai aap sachcha sona hain .badhai itni khoobsurat abhivyakti ke liye.

Comment by akhilesh mishra on November 22, 2012 at 1:29pm

बहुत सुंदर कविता ।मैडम ,बधाई इस सुंदर  कृति के लिए ।

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