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तपता रेगिस्तान

तपती दोपहरी में पसीने से
भीगा हुवा ये तन
दूर एक रेगिस्तान में
पानी को तरस रहा है ये मन
है इसी आस में की बारिश तो होगी कभी
हमारे सुने से आँगन में

कोई फुलवारी तो खिलेगी कभी
तपती रेत पर कभी एक पानी की बूँद न
गिरी
रेगिस्तान में एक घर में जला रही है दोपहरी
रेत के टिलों में पेड़ की
छाव को
तरस रहा है ये मन
कभी तो बारिश होगी
कभी तो भिगेगा ये तन
तपता
रेगिस्तान है फिर भी प्यारा यहाँ का घर
बारिश न आए तो भी
रहना है यहाँ सारी
उमर

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on August 21, 2012 at 6:05pm

पूरी रचना में एक आशावाद है कि कुछ भी हो रहना यहीं है क्योंकि यह अपना घर है, बधाई इस रचना के लिए

Comment by saroj sharma on August 21, 2012 at 5:51pm

dhanyavad naval jii

Comment by Naval Kishor Soni on August 21, 2012 at 4:19pm

तपती दोपहरी में पसीने से
भीगा हुवा ये तन
दूर एक रेगिस्तान में
पानी को तरस रहा है ये मन-------------bahut khub saroj ji.

Comment by Rekha Joshi on August 21, 2012 at 11:48am

रेगिस्तान है फिर भी प्यारा यहाँ का घर 
बारिश न आए तो भी
रहना है यहाँ सारी 
उमर,अपना आशियाना अपना हो होता है जिसे आपने बहुत ही सुन्दरता से शब्दों में पिरोया है ,सरोज जी ,हार्दिक बधाई 

Comment by saroj sharma on August 20, 2012 at 10:15pm

धन्यवाद

Comment by अशोक पुनमिया on August 20, 2012 at 8:41pm

सरोज जी,

सुन्दर भावों को लिए है आपकी ये रचना.
जहां रहना है हमेशा,वो जगह हमेशा ही,तमाम खामियों के बावजूद हमें प्रिय होती ही है,और यही भाव हमें खुश भी रखता है.

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