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बहुत तेज़ है मेरी लुगाई बाबाजी

 

ओ बी ओ परिवार के समस्त स्वजनों को अलबेला खत्री का विनम्र प्रणाम .

एक शो  और एक शूटिंग के  चलते मैं  तीन दिन  सूरत से बाहर रहा . इसलिए यहाँ हाज़िरी नहीं दे पाया . परन्तु  अच्छा ये रहा कि  महा उत्सव  में एक कुंडलिया और एक  घनाक्षरी  मैंने  टी वी पर भी सुनाई तो लोगों ने  ख़ूब सराहा .  बाबाजी वाली एक ग़ज़ल भी  मैंने  "बहुत ख़ूब" प्रोग्राम में प्रस्तुत कर दी  अगले हफ्ते उसे आप दबंग चैनल पर देख सकेंगे. एक  तुकबन्दी  आज पुनः आपकी सेवा में रख रहा हूँ .

सादर




घर-घर से आवाज़ ये आई बाबाजी
मार  ही  देगी  ये महंगाई बाबाजी

जनता जब से जूत चलाना सीख गई
नेताओं   की  शामत   आई  बाबाजी

उसके आगे कोई बहाना ना चलता
बहुत तेज़ है  मेरी  लुगाई  बाबाजी

जाने क्यों मुम्बई में घर से भी ज़्यादा
ओ बी ओ की  याद थी  आई  बाबाजी

हमने सुना है सारी ख़ुदाई एक तरफ़
एक  तरफ़  जोरू  का  भाई  बाबाजी

35 लाख का टायलेट क्यों न हो इनका
सत्ता   में    हैं    ये    इंकाई    बाबाजी

एक बार तुम राजनीति में घुस जाओ
फिर कितनी भी  करो कमाई बाबाजी

बाहर से तो  हँसा  रहा  है 'अलबेला'
लेकिन  भीतर  भरी रुलाई  बाबाजी


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Comment

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Comment by Albela Khatri on June 14, 2012 at 8:55am

सौन्दर्य  तो आप जैसे गुणी पाठकों व मित्रों की  दृष्टि में है  सम्मान्य डॉ प्राची सिंह जी,  परन्तु आपके  शब्दों से जो उत्साह वर्धन होता है  उसके लिए मैं और बाबाजी दोनों  आपके धन्यवादी हैं

सादर

Comment by Albela Khatri on June 14, 2012 at 8:52am

सम्मान्य  सौरभ जी,
सचमुच,  घर के  लोगों की याद आती ही है.......
अच्छी तुक लगाई  जी आपने........ये बाबा लोग अपने को बाबाजी बना के ही छोड़ेंगे...हा हा हा

आभार आपकी प्रतिक्रिया और  सराहना के लिए
सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 14, 2012 at 8:38am
बहुत सुन्दर आ. अलबेला जी
आपकी हर रचना एक से बढ़ कर एक रोचक है..
आपको नित नयी ऊंचाइयों की तरफ बढ़ती रचनाओं के लिए हार्दिक बधाई.
सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 14, 2012 at 5:47am

जाने क्यों मुम्बई में घर से भी ज़्यादा
ओ बी ओ की याद थी आई बाबाजी

परिवार के सदस्यों की हर घड़ी याद आती रहती है.  यह प्रेमीजन की सामान्य दशा है. ..

इस बाबाजी प्रकरण के लिये सादर बधाइयाँ.   देखिये ये बाबाजी कितने स्कैम पर से पर्दा उठाते हैं ..

आपकी तुक में मुझे भी सुर मिलाता देखिये, भाईजी -

जबसे हमने खुद पर हँसना सीख लिया
भली लगे  हर  पीर  पराई  बाबाजी.. .

 

Comment by Albela Khatri on June 14, 2012 at 12:02am

सम्मान्य अरुण कान्त शुक्ला जी,
आओ थोड़ा मिल कर हँसलें.............हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा
जय हो !

Comment by Albela Khatri on June 14, 2012 at 12:00am

भाई कुमार  गौरव अजीतेन्दु  जी,
आपकी टिपण्णी भी गर्दा है...हा हा हा
___आभार

Comment by अरुण कान्त शुक्ला on June 13, 2012 at 11:59pm

बाहर से तो  हँसा  रहा  है 'अलबेला'
लेकिन  भीतर  भरी रुलाई  बाबाजी

जिंदगी की यही है सचाई बाबाजी

जब रोना था , तभी हंसी आई बाबाजी ... हा.. हा..बहुत बढ़िया बाबाजी ..

Comment by Albela Khatri on June 13, 2012 at 11:58pm

आपकी सराहना  सर आँखों पर  आदरणीय  बिश्वजीत यादव जी.......
आभार

Comment by Albela Khatri on June 13, 2012 at 11:57pm

श्रद्धेय उमाशंकर मिश्रा जी.........मैं  अच्छी कविता  उसी को मानता हूँ  जो सभी वर्ग  के लोगों को पसंद  आये.  काव्य  का कथ्य और उसकी सरल सहज भाषा  जन जन तक पहुंचे  और उसे आनंद अथवा प्रेरणा  दे, यही तो  सफलता है सृजन की .

आपने बहुत ही सार्थक टिपण्णी दे कर  मेरा मनोबल बढ़ाया है
आपको शत शत धन्यवाद

Comment by Albela Khatri on June 13, 2012 at 11:50pm

बहुत बहुत धन्यवाद  डॉ सूरज जी,
आपकी सराहना  सदैव बल देती है
आभार

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