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रिश्तों की विचित्रता




रात की धूमिल परछाई, 
तारो की चमक समेट लेती है,
दिन की गहरी धूप,
सब कुछ मुरझाये देती है...

न रात का दिन से,
न दिन का तारों से,
और न तारों का रात से,
कोई रिश्ता दिखता है...

देखो तो हर कुछ, 
शून्य में सिमटा है,
सब कुछ अलग होकर भी,
सब एक में सिमटा है...

रेत की तरह रिश्तें,
हाथों से फिसल जाते है,
जो होते हैं आने वाले,
वो काफिले चुपके से गुज़र जाते हैं...

पर विचित्रता को देखिये
रिश्तो और ज़िन्दगी की,  

जहाँ रेत को  को मुठ्ठी  से,
और ,
रिश्तों को ज़िन्दगी से,
बाँधे रखना मुश्किल है,
वही सागर की बूँद को सागर से ,
और,
रिश्तों को दिल से 
जुदा करना मुश्किल है....

रेत के मुट्ठी से,
निकल जाने पर भी,
कण हाथों में रह जाते हैं,
रिश्तो के ज़िन्दगी से,
निकल जाने पर भी,
उनके एहसास दिल में रह जाते है....
 

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Comment

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 11, 2012 at 8:26pm

इस रचना की पंच लाइन ......

रेत के मुट्ठी से,
निकल जाने पर भी,
कण हाथों में रह जाते हैं,
रिश्तो के ज़िन्दगी से,
निकल जाने पर भी,
उनके एहसास दिल में रह जाते है....
आभार योग्यता जी , पर सच कहूँ तो रचना और कसाव मांग रही है | प्रयास पर आभार |
Comment by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 7:14pm

waah bahut khoob....

Comment by AVINASH S BAGDE on May 11, 2012 at 5:02pm

salagn chitr bhi bolta sa hai...wah...

Comment by AVINASH S BAGDE on May 11, 2012 at 5:00pm

रेत के मुट्ठी से,

निकल जाने पर भी,
कण हाथों में रह जाते हैं,
रिश्तो के ज़िन्दगी से,
निकल जाने पर भी,
उनके एहसास दिल में रह जाते है....yahi saar hai...yahi sarthakta hai..Yogyata ji...
Comment by आशीष यादव on May 11, 2012 at 2:44pm
sundar prastuti. rishto ke sapekshyata ko khub chitrit kiya hai.

badhai.
Comment by MAHIMA SHREE on May 11, 2012 at 10:21am
रेत की तरह रिश्तें,
हाथों से फिसल जाते है,
जो होते हैं आने वाले,
वो काफिले चुपके से गुज़र जाते हैं...
वाह योग्यता जी ... बहुत ही सुंदर अभिवयक्ति .... रिश्तो को कितनी खूबसूरती से परिभाषित किया है ..
बहुत बधाई आपको
Comment by Ashok Kumar Raktale on May 11, 2012 at 6:33am

रेत की तरह रिश्तें,
हाथों से फिसल जाते है,
जो होते हैं आने वाले,
वो काफिले चुपके से गुज़र जाते हैं...

रिश्ते पल में बदल जाते हैं. जिंदगी में रिश्तों की अहमियत और हकीकत से रूबरू कराती सुन्दर रचना बधाई योग्यता जी.

Comment by Yogyata Mishra on May 10, 2012 at 5:20pm

thnq Bhawesh Raipalji N Rajesh Kumariji

Comment by Bhawesh Rajpal on May 10, 2012 at 1:53pm
रेत के मुट्ठी से,
निकल जाने पर भी,
कण हाथों में रह जाते हैं,
रिश्तो के ज़िन्दगी से,
निकल जाने पर भी,
उनके एहसास दिल में रह जाते है
बहुत सुन्दर  ! रिश्ते बनते हैं , रिश्ते बिगड़ते हैं , लेकिन अपनी छाप छोड़ जाते हैं  ! 

अच्छी रचना के लिए बधाई  ! 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 10, 2012 at 1:49pm

वाह योग्यता जी जिंदगी में रिश्तों के लिए अच्छे बिम्ब प्रस्तुत किये हैं सच में रिश्तों कि चुभन दिल में हमेशा रहती है बहुत उम्दा लेखन ...वाह 

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