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तुम क्या समझो तुम क्या जानो......मोनिका जैन "डाली"

तुम क्या समझो तुम क्या जानो
है पीर कहा ? है दर्द कहाँ ?
क्यों है मन आकुल व्याकुल सा
क्यों है तन थका थका सा ये
क्यों हार - हार कर  भी लेती हूँ
जीने की प्रबल प्रतिग्या मैं
क्यों बुझे हूऐ दीपों में मैं
आशा की जोत जलाती हूँ  
क्यों हूँ  रूठी हूँ दुनिया से मैं
क्यों फिर भी सबसे हिली मिली
हैं प्रश्न बहुत पर फिर भी
मैं क्यों खडी - खडी मुस्काती हूँ ?
क्या है ? क्यों है ? कैसा है ?
प्रश्नों की ठेलम ठेली है !
हो चकित देख कर मुझको तुम
हो भ्रमित कभी झुंझलाते हो
करते हो तुम भी प्रश्न कई
पर कभी नहीं सोचा तुमने
पर कभी नहीं समझा तुमने
उन प्रश्नों  का उत्तर है ये
मैं नहीं रही बस स्त्री अब
मैं मा हूँ अब बस मा हूँ
जो गुंथी गई पीड़ा से है
जो बुनी गई ममता से  है
तुम क्या समझो तुम क्या जानो
क्यों हार - हार कर  भी लेती हूँ
जीने की प्रबल प्रतिग्या मैं

  • Monika Jain "Dolly" 06 May 2012

Views: 1416

Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 8, 2012 at 3:45pm
बहुत खूबसूरत रचना प्रिय मोनिका जी..
गहनतम पीड़ा के एहसासों को शब्द दियें हैं आपने,
ये सच है की स्त्री कई बार इतनी उपेक्षिता हो जाती है, कि उसका जीवन ही अर्थविहीन हो जाता है... पर जब वो माँ बनती है, तो मासूम बच्चा कहता है, माँ मैं सिर्फ तेरे भरोसे ही आया हूँ... नहीं जी सकता मैं तेरे बिना... तब स्त्री सिर्फ एक माँ ही बन जाती है, वायदा करती है अपने आप से अपनी ही ज़िंदगी का, क्योंकि, बच्चा माँ के बिना अधूरा रह जाता है...
माँ हर एक ज़हर को पी कर भी जी लेती है, क्योंकि जानती है, वो नहीं जियेगी तो बच्चे का क्या होगा...?
आपकी इस अभिवक्ति पर आपको , व मातृत्व को नमन.
Comment by राज लाली बटाला on May 8, 2012 at 1:33am

तुम क्या समझो तुम क्या जानो
है पीर कहा ? है दर्द कहाँ ? Achhi lagi yeh rachna !! Monica ji ! 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 7, 2012 at 9:16pm

मोनिका जी, आपकी प्रस्तुत रचना प्रवाहमान है तथा इसका कथ्य उच्च है.  इस अतुकांत कविता में शब्द-संयोजन भी आपने बहुत ही अच्छी तरह से निभाया है. 

इस भूमिकापरक अभिव्यक्ति पर ढेरों बधाई व शुभकामनाएँ स्वीकारें ...

क्यों है मन आकुल व्याकुल सा
क्यों है तन थका थका सा ये
क्यों हार - हार कर भी लेती हूँ
जीने की प्रबल प्रतिग्या मैं
क्यों बुझे हूऐ दीपों में मैं
आशा की जोत जलाती हूँ

Comment by Abhinav Arun on May 7, 2012 at 6:34pm

मैं नहीं रही बस स्त्री अब
मैं मा हूँ अब बस मा हूँ
जो गुंथी गई पीड़ा से है
जो बुनी गई ममता से  है
माँ की ममता को नमन है और मोनिका जी आपकी इस रचना की भी जितनी तारीफ की जाए कम है बहुत सुन्दर भाव संयोजन हार्दिक बधाई !!

Comment by ganesh lohani on May 7, 2012 at 2:41pm

हैं प्रश्न बहुत पर फिर भी 
मैं क्यों खडी - खडी मुस्काती हूँ ? 
क्या है ? क्यों है ? कैसा है ? 
प्रश्नों की ठेलम ठेली है !

सुन्दर अभिव्यक्ति मोनिका जी  शुभकामनायें 

Comment by MAHIMA SHREE on May 7, 2012 at 1:29pm
क्यों हार - हार कर भी लेती हूँ
जीने की प्रबल प्रतिग्या मैं
क्यों बुझे हूऐ दीपों में मैं
आशा की जोत जलाती हूँ
क्यों हूँ रूठी हूँ दुनिया से मैं
क्यों फिर भी सबसे हिली मिली
हैं प्रश्न बहुत पर फिर भी
मैं क्यों खडी - खडी मुस्काती हूँ ?
क्या है ? क्यों है ? कैसा है ?

मैं नहीं रही बस स्त्री अब
मैं मा हूँ अब बस मा हूँ
जो गुंथी गई पीड़ा से है
जो बुनी गई ममता से है

आदरणीया मोनिका जी , नमस्कार
बहुत ही सुंदर रचना .. मन के भावो से रची बसी
बधाई स्वीकार करें
Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 7, 2012 at 10:35am

आशा की जोत जलाती हूँ  
क्यों हूँ  रूठी हूँ दुनिया से मैं 
क्यों फिर भी सबसे हिली मिली 
हैं प्रश्न बहुत पर फिर भी 

बहुत सुन्दर| बधाई मोनिका जी |

Comment by Neelam Upadhyaya on May 7, 2012 at 9:44am

bahut hi sunder abhivyakti. Badhayee Monika ji.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 7, 2012 at 9:04am

मैं नहीं रही बस स्त्री अब 
मैं मा हूँ अब बस मा हूँ 
जो गुंथी गई पीड़ा से है 
जो बुनी गई ममता से  है
तुम क्या समझो तुम क्या जानो
क्यों हार - हार कर  भी लेती हूँ
जीने की प्रबल प्रतिग्या मैं....माँ होकर स्त्री सब दुनिया को भूल जाती है अपने को भूल जाती है उसकी परिधि में सिर्फ  अपने बच्चों के सुख दुःख ही रह जाते हैं ...खूब वर्णन किया है एक माँ एक नारी के अस्तित्व का ..बहुत सुन्दर| बधाई मोनिका जी |

Comment by Bhawesh Rajpal on May 7, 2012 at 6:17am

माँ की पीड़ा का वर्णन  ! अद्भुत शब्दावली  !  दिल को पिघला दिया ! आँखे भर आई !  

माँ  तुम  बहुत याद आ रही हो  !

बहुत सुन्दर रचना !

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