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कौरवों के साथ में धृतराष्ट्र अँधा है

कौरवों के साथ में धृतराष्ट्र अँधा है
धर्म है पाखंड सा हर दिल दरिंदा है

हिंद में ही लुट रही क्यूँ लाज हिंदी की
पश्चिमी रंग में रंगा हर एक बंदा है

ना हया ना शर्म है आदम के अन्दर अब
औ सनातन धर्म भी मंदिर में धंधा है

आज तक अच्छा किया ना एक नेता ने
जो करे अच्छा यहाँ वो ही तो गन्दा है

फिक्र तुझको हो रही जो आज रुखसत की
खानदानी ना सही यारों का कन्धा है

भीख ना मिलती गरीबों के लिए कुछ भी
"दीप" गुंडा फिर रहा लेता जो चंदा है

संदीप पटेल "दीप"

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Comment

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Comment by dilbag virk on May 7, 2012 at 9:21pm

शानदार.....................

Comment by Abhinav Arun on May 7, 2012 at 6:28pm

हिंद में ही लुट रही क्यूँ लाज हिंदी की
पश्चिमी रंग में रंगा हर एक बंदा है

करारा व्यंग्य करती ग़ज़ल हार्दिक बधाई !!

Comment by ganesh lohani on May 7, 2012 at 3:04pm

वाह ! अच्छा कटाक्ष किया है | जो न समझे वो अनाड़ी है |बधाई | 

Comment by MAHIMA SHREE on May 7, 2012 at 1:02pm
धर्म है पाखंड सा हर दिल दरिंदा है
पश्चिमी रंग में रंगा हर एक बंदा है
जो करे अच्छा यहाँ वो ही तो गन्दा है
संदीप जी , नमस्कार ,
आपकी रचना की सभी पंक्तिया गहन बिन्दुओ को उठा रही है ...
सार्थक प्रयास .. बधाई स्वीकार करें
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 7, 2012 at 10:52am

हिंद में ही लुट रही क्यूँ लाज हिंदी की
पश्चिमी रंग में रंगा हर एक बंदा है

badhai

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