For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

लघु कथा : हाथी के दांत 

बड़े बाबू आज अपेक्षाकृत कुछ जल्द ही कार्यालय आ गए और सभी सहकर्मियों को रामदीन दफ्तरी के असामयिक निधन की खबर सुना रहे थे. थोड़ी ही देर में सभी सहकर्मियों के साथ साहब के कक्ष में जाकर बड़े बाबू इस दुखद खबर की जानकारी देते है और शोक सभा आयोजित कर कार्यालय आज के लिए बंद करने की घोषणा हो जाती है | सभी कार्यालय कर्मी इस आसमयिक दुःख से व्यथित होकर अपने अपने घर चल पड़ते  है | बड़े बाबू दफ्तर से निकलते ही मोबाइल लगा कर पत्नी से कहते है "सुनो जी तैयार रहना मैं आ रहा हूँ, आज  सिनेमा देखने चलना है"

Views: 2669

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 22, 2012 at 9:52am

बाग़ी जी, आपकी लघु कथा पढ़ कर आनंद आया. बहुत ही कसी हुई ओर चुस्त लघुकथा कही है. पूरी कहनी में एक भी शब्द कम या फालतू नहीं है जिसकी वजह से इसका रूप ओर भी निखरा है. आज के ई नसान की दोगली मानसिकता पर सटीक व्यंग करती इस लघुकथा के लिए मैं आपको दिल से बधाई देता हूँ. जैसा कि मैंने पूर्व में भी ज़िक्र किया था, लघुकथा क्योंकि बहुत ही कम शब्दों में कही जाती है अत: इसका शीर्षक भी ऐसा होना चाहिए जोकि कहानी की आत्मा के साथ इन्साफ करता हो, आपकी इस लघुकथा का इस से बेहतर शीर्षक शायद  ही कोई ओर हो सकता था. अत: इसके लिए एक्स्ट्रा शाबाशी.    


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 22, 2012 at 8:37am

गणेश जी आपकी लघु कथा अपना मुख्य सार पहुचाने में सक्षम है इंसानों की दोहरी वैचारिक मानसिकता दोहरी पद्दति दोहरे व्यक्तित्व की ओर इंगित करती है जो सामयिक है जीवन के अनुभव में  बहुत से एसे लोगों से रूबरू होना पड़ता है ओर लघु कथा की यही विशेषता है जो कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाए सोचने के लिए .बधाई स्वीकारें 

Comment by वीनस केसरी on March 22, 2012 at 12:19am

सौरभ जी मैंने 
"मंटो की लघुकथाएं" 

"मंटो लंबी कहानियाँ"

"मंटो की बदनाम कहानियां" 
"मंटो की श्रेष्ठ कहानियाँ"
और
"मंटो: मेरा दुश्मन " (उपेन्द्र नाथ अश्क जी द्वारा मंटो की मृत्यु के बाद लिखा गई लाजवाब किताब)

पढ़ हैं और लाखों करोणों लोगों की तरह मैं भी मंटो का फैन कूलर एग्जास्ट आदि हूँ :)))) 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 22, 2012 at 12:10am

वीनसजी, मंटो तो बस मंटो हैं. .. सआदत हसन मंटो.

उनकी ’हलाल और झटका’ मिले तो ज़रूर पढियेगा.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 21, 2012 at 11:45pm

भाई प्रवीन जी, मैं किसी की टिप्पणी को अन्यथा नहीं लेता , वस्तुतः वह लोजिकल हो, अन्यथा आपकी टिप्पणी भी प्रायोजित और इस लघु कथा के शीर्षक के मानिद प्रतीत होती है |

बहरहाल आपकी टिप्पणी पर आभार |

Comment by वीनस केसरी on March 21, 2012 at 11:42pm

मैं तो वापस आया था कि मुझे मंटो की एक लघु कथा मिल गई तो सोचा आप लोग को पढ़वाता चलूँ मगर यहाँ बात दूसरी हो गई है

मित्र ANAND PRAVIN जी, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यहाँ उम्र में छोटे बड़े का कोंई भेद नहीं है
उदाहरण के तौर पर आप मुझे भी देख सकते हैं
रही बात....
तो मुझे लगता है कि हर टिप्पणी वह चाहे प्रशंसात्मक हो या सुझाव या प्रश्नात्मक सभी लघु आलोचना ही होती है

खैर आप सभी मंटो की लघु कथा पढ़िए 

दो दोस्तों ने दस बीस लड़कियों में से एक चुनी और 42 रुपये देकर उसे खरीद लिया। रात गुज़ारकर एक दोस्त ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भन्ना गया, “हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मज़हब की हो।”
लड़की ने जवाब दिया, “उसने झूठ बोला था।”
यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा ,“उस हरामज़ादे ने हमारे साथ धोखा किया है । हमारे ही मज़हब की लड़की थमा दी । चलो वापस कर आएँ।”


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 21, 2012 at 11:32pm

वीनसजी,  अनुज आनन्द से इसी अध्ययन की बात कह रहा था मैं.  यह जानना चाहिये कि अध्ययन रचनाकर्म की समानान्तर प्रक्रिया है. लघुकथाओं का तो भरा-पूरा समृद्ध साहित्य है. 

आनेवाले दिनों में अनुज आनन्द भी समरस होते जायेंगे, यह मेरा विश्वास है.

धन्यवाद.

Comment by वीनस केसरी on March 21, 2012 at 11:28pm

......हाँ ये अतिलघु की श्रेणी में अवश्य आता है......

ANAND PRAVIN जी आपका कमेन्ट पढ़ने के बाद अचानक मन में एक सवाल आ गया तो पूछ ही लेता हूँ 
 
क्या आपने मंटो की लघु कथाएं पढ़ी हैं ?

अगर आपका जवाब "नहीं" है तो मेरा निवेदन है कि "पढ़िए"

और मंटो कि उस "लघु कथा" को जरूर पढियेगा जो उन्होंने मात्र "१७" शब्दों में लिखी है


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 21, 2012 at 11:02pm

आनन्द जी, भाई गणेशजी से इस तरह कुछ कहने के पूर्व आपसे तनिक अध्ययन की अपेक्षा है.. फिर देखिये कितना मजा आता है. एकदम से कुछ कहना कभी-कभी उचित नहीं होता.

शुभेच्छाएँ

Comment by Dr. Shashibhushan on March 21, 2012 at 9:41pm

आदरणीय बागी जी,
सादर !
"इस कदर बेजान सी, संवेदनायें हो गयी हैं,
मृदुल, स्नेहिल भावनायें, लग रहा है सो गयी हैं !
क्या कहें बागी जी, नीरस सभ्यता की बात है ये,
प्रेम के बदले दिलों में शून्यता सी बो गयी हैं !""
सार्थक लघु कथा !
हार्दिक बधाई !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Monday
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेतुझे याद किया था हमने ... "क्या...तुम्हारे मन के द्वार…See More
Monday
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Friday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service