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प्रथम पुष्प अर्पित तुमको, मसलो या श्रृंगार करो,
आया तेरे द्वार प्रभु, मेरा बेड़ा पार करो ,

चाहत थी जीवन की मेरी, दुखियों का दर्द उधार लूं
उजड़ चुके है जिनके घर, उनको एक नव संसार दूं

दामिन दमकी जला आशियाँ, ऐसी मची तबाही,
रही अधूरी मेरी तमन्ना, ऐसी आंधी है आई,

छाया तम है जीवन में, आशा की किरण कोई नहीं,
सर्वस्व समर्पित चरनन मां, जीवन में कुछ शेष नहीं,

श्रद्धा सुमन अर्पित तुमको, मन उपवन क्यूँ खाली,
हरा भरा रखना डाली को, इस जीवन का तू माली |

(संशोधित)

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Comment by Deepak Sharma Kuluvi on March 27, 2012 at 2:18pm

 प्रदीप जी एक एक करके आज आपकी रचनाएँ पढ़ रहा था अथाह सागर है ज्ञान भण्डार का

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 4, 2012 at 7:13pm

DHANYAVAAD TRIPATHI JI , JHOOMIYE HOLI KI SHUBH KAMNAYEN. DHANYAVAAD. 

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 4, 2012 at 6:51pm
बहुत सुन्दर भाव है आदरणीय कुशवाहा
जी इस पंक्ति पर तो मन झूम उठा-

'प्रथम पुष्प अर्पित तुमको,मसलो या श्रृंगार करो।'
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 4, 2012 at 6:32pm

धन्यवाद मृदू  जी 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 4, 2012 at 6:24pm

आदरणीय प्रभाकर जी, तकनीकी पक्ष का ज्ञान नही है. लिख लेता हूँ बस. संवारते रहिए कृपया आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 4, 2012 at 6:21pm

धन्यवाद वाहिद  भाई. आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 4, 2012 at 6:19pm

धन्यवाद राकेश जी, जीते रहिए 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 4, 2012 at 6:18pm

धन्यवाद आनंद जी. जीते रहिए 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 4, 2012 at 6:15pm

आदरणीय बागी जी , सादर अभिवादन प्रोत्साहन हेतु धन्यवाद

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 4, 2012 at 6:12pm

स्नेही महिमा , एक बेटी अपने पिता का दर्द नही समझेगी ..? मुझे कुछ नही हुआ है हँसो और हंसाओ. धन्यवाद 

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