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सरहद पर जाते वक्त

सरहद पर जाते वक्त 

वो  जो नज़र झुका कर कहा तुमने 
प्रिया! लौट कर न आ पाऊं  शायद
फिर से तेरी बांहों में 
जम्भूमि के कर्ज  चुकाने हैं 
नहीं निभा पाउँगा तुम्हारे प्रति अपना फर्ज 
हो सके तो माफ़ कर देना मुझे 
सच कंहूँ तो  तेरी इस शपथ  से  
डबडबाये   जरुर थे मेरे नयन  
पर यकीं कर  साथी 
मेरा माथा गर्व से तन गया था उस वक्त 
कितनी खुश नसीब होती हैं 
वो पत्नियाँ  ,वो प्रेमिकाएं 
जिनके पति ,प्रेमी 
देश-प्रेम में मिट जाते हैं 
 
--आशा  पाण्डेय ओझा 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 17, 2012 at 5:47pm

इस उच्च मानसिक दृढ़ता के लिये उन्नत संस्कार प्रेरित किया करते है जो प्रारम्भ से ही बूँद-बूँद पगाये जाते हैं. तभी तो, मनोमय भाव मात्र देह की दशा और आवश्यकता से ऊपर और प्रभावी हो पाते हैं.  और तभी, स्पष्ट उत्तरदायित्त्व ’स्व’ के सतही स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके अत्यंत उज्ज्वल पक्ष से संपुष्ट कर पाता है.
इस सांस्कारिक रचना के लिये आदरणीया आशाजी आपका अत्यंत आभार.  बहुत दिनों बाद मैं इस पटल पर आपकी कोई रचना प्रेषित हुई देख पा रहा हूँ.

सादर


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 17, 2012 at 4:11pm

सच कंहूँ तो  तेरी इस शपथ  से  

डबडबाये   जरुर थे मेरे नयन  
पर यकीं कर  साथी 
मेरा माथा गर्व से तन गया था उस वक्त
वाह वाह आशा दीदी , बहुत ही पतली रेखा से एक सैनिक की पत्नी की बहादुरी को रेखांकित की है , बहुत बहुत बधाई आपको ।
Comment by AVINASH S BAGDE on February 17, 2012 at 11:15am

....मेरा माथा गर्व से तन गया था उस वक्त ..SUNDER BHAVPURN KAVITA Aasha ji.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 16, 2012 at 8:28pm

सही कहा है आपने हम को देश के वीरों पर गर्व करना चाहिए बहुत अच्छा लिखा है आपने.

कृपया ध्यान दे...

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