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है खुश खूब झकझोर डाली हवा- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२/१२२/१२२/१२

नगर भर  चले  दौड़  काली हवा
है खुश खूब झकझोर डाली हवा।१।
*
गिरे फूल कलियाँ विवश भूमि पर
बजा  पात  कहती  है  ताली हवा।२।
*
कभी दान जीवन सभी को दिया
हुई  आज  लेकिन  सवाली  हवा।३।
*
कहाँ  से  प्रदूषण  धरा  का  मिटे
नहीं  सीख  पायी  जुगाली  हवा।४।
*
कँपा शीत में नित बढ़ी जब तपन
गयी   लौट   कुल्लू मनाली   हवा।५।
*
तनिक तो कहीं बात होती है कुछ
किसी की चली कब है खाली हवा।६।
*
उड़ाकर   दुपट्टा   बिखेरे   वो  लट
हिलाती  है  कानों  की  बाली हवा।७।
*
घुटा खूब दम तब मगर अब चली
तेरे  आगमन   से   निराली  हवा।८।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 15, 2024 at 9:46pm

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

आपका सुझाव अच्छा है। किन्तु उससे मेरा मन्तव्य बदल रहा है। मैंने यहाँ पत्तों से ताली बजवाने के संदर्भ में लिया है। सादर..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 15, 2024 at 9:43pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Sushil Sarna on March 12, 2024 at 9:22pm
वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी वाह बेहतरीन प्रस्तुति सर हार्दिक बधाई
Comment by Chetan Prakash on March 12, 2024 at 12:02pm

छोटी बह्र पर अच्छी ग़ज़ल  ! दूसरे शे'र का सानी यूँ बेहतर होता , ' बजा पात देती है ताली हवा ' , बधाई,' मुसाफिर' साहब  ! 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 7, 2024 at 9:08pm

आ. भाई श्यामनारायण जी अभिवादन। गजल पर उपस्थित और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।

Comment by Shyam Narain Verma on March 7, 2024 at 10:44am
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर

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