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ग़ज़ल - अभी दुश्मनी में वो शिद्दत नहीं है

122 122 122 122

अभी दुश्मनी में वो शिद्दत नहीं है

हवा को चराग़ों से दिक़्क़त नहीं है

सभी को यहाँ मैं ख़फ़ा कर चुका हूँ
मुझे सच छुपाने की आदत नहीं है

मुझे है बहुत कुछ बताने की चाहत
मगर बात करने की मोहलत नहीं है

किसी से तुझे क्यों मिलेगी मुहब्बत
तुझे जब तुझी से मुहब्बत नहीं है

हक़ीक़त कहूँ तो मैं हूँ ख़ैरियत से
मगर ख़ैरियत में हक़ीक़त नहीं है

मिरे दिल पे तेरी हुक़ूमत है लेकिन
तिरे दिल पे मेरी हुक़ूमत नहीं है

ज़माने से रिश्ते सभी मैंने तोड़े
मुझे अब किसी से शिकायत नहीं है

सभी को है उल्फ़त यहाँ 'ज़ैफ़' ख़ुद से
किसी को भी तेरी ज़रूरत नहीं है 

(मौलिक/अप्रकाशित)

Views: 343

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Comment by Zaif on November 25, 2022 at 3:38pm

आ. समर सर जी, बहुत बहुत आभार आपका। सादर

Comment by Samar kabeer on November 24, 2022 at 5:20pm

जनाब 'ज़ैफ़' जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने बधाई स्वीकार करें ।

'मोहलत'---"मुहलत"

Comment by Zaif on November 24, 2022 at 4:16am

आदरणीया राखी मैम, बहुत आभार आपका। सादर।

Comment by Rakhee jain on November 24, 2022 at 1:35am
  • बहुत खुबसूरत ग़ज़ल
  • मगर खैरियत में हकीकत नहीं है वाह बहुत ही खूब

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