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पहाड़ की ऊंची चोटी पर
अपने चारों तरफ
हरियाले वृक्षों से घिरा
मैं ठूँठ सा तन्हा खड़ा हूँ ।
कुछ वर्ष पूर्व
आसमानी बिजली ने
हर ली थी मेरी हरियाली
यह सोच कर कि
वो मेरे तन-बदन को
जर्जर कर मेरे अस्तित्व को
नेस्तनाबूद कर देगी ।

मगर
वक्त के साथ
अपने नंगे बदन पर
मैं मौसम के प्रहार सहते-सहते
एक मजबूत काठ में
परिवर्तित होता गया ।

आज मैं
आसमान से
अपनी विध्वंसक शक्ति का डंका बजाती
बिजली के सम्मुख
उसकी शक्ति को
धत्ता देता
मौन, निर्भीक
हर प्रहार को सहता
भय के हर बन्धन से मुक्त
ठूँठ के आवरण में
किसी शान्त योगी सा
स्थिर खड़ा हूँ
पहाड़ की ऊंची चोटी पर

सुशील सरना / 26-9-21
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on October 4, 2021 at 10:36pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 3, 2021 at 9:37pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। बहुत सुन्दर रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on October 3, 2021 at 4:27pm
आदरणीय समर कबीर साहब , आदाब, सृजन आपकी स्नेहिल प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Sushil Sarna on October 3, 2021 at 4:26pm
आदरणीय अमन सिन्हा जी सृजन आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभारी है सर
Comment by Sushil Sarna on October 3, 2021 at 4:25pm
आदरणीय अमीरुद्दीन साहिब, आदाब - सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार । सहमत
Comment by Samar kabeer on September 28, 2021 at 7:29pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब , अच्छी रचना हुई है , बधाई स्वीकार करें I 

Comment by AMAN SINHA on September 28, 2021 at 9:58am

सुनील रसना साहब,

बेहद खूबसूरत रचना हेतु बधाई स्वीकार करें ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 27, 2021 at 5:32pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है बधाई स्वीकार करें। रचना का शीर्षक भय के बजाय 'भयमुक्त' होना समीचीन होगा।  सादर। 

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