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ज़िंदगी रास्ता देखती हो मेरा...( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

212  212  212  212

ज़िंदगी रास्ता देखती हो मेरा
सामना मौत से भी तभी हो मेरा  (1)

मैं चलूँ अपने बच्चों की उंँगली पकड़
फिर भले ये सफ़र आख़िरी हो मेरा  (2)

वाक़िआ होगा पहला यक़ीं मानिए
सामना मौत से जब कभी हो मेरा  (3)

अब ये मुमकिन नहीं आज के दौर में
शह्र में भी रहूँ गांँव भी हो मेरा  (4)

ख़ाक ऐसे करें नफ़रतों का जहाँ
आग तेरी रहे और घी हो मेरा  (5)

ज़िंदगी को भी आना पड़े सामने
मौत जब भी पता पूछती हो मेरा  (6)

आज तक शख़्स जो हुक़्म देता रहा
एक दिन के लिए अर्दली हो मेरा  (7)

*मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by सालिक गणवीर on November 2, 2020 at 12:23pm

आदरणीय भाई ब्रजेश कुमार 'ब्रज ' जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई के लिये आपको तह -ए - दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।

Comment by सालिक गणवीर on November 2, 2020 at 12:22pm

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई के लिये आपको तह -ए - दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।

Comment by सालिक गणवीर on November 2, 2020 at 12:19pm

आदरणीय भाई निलेश जी
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई के लिये आपको तह -ए - दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। आपकी इस्लाह के लिए मश्कूर ओ ममनून हूँ ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2020 at 8:56pm

खूबसूरत ग़ज़ल आदरणीय...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 31, 2020 at 8:25pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 30, 2020 at 6:09pm

आ. सालिक जी,

अच्छी ग़ज़ल हुई है.. विस्तार से समर सर कह ही चुके हैं..
.
मैं चलूँ अपने बच्चों की उंँगली पकड़
और फिर वो सफ़र आख़िरी हो मेरा... चूँकि वैसा लम्हा आया नहीं है इसलिए ये की जगह वो आएगा (दूरस्थ भाव)
.
अब ये मुमकिन नहीं आज के दौर में.. अब आने के बाद आज के दौर में कहना दुहराव है ..
आज के दौर में ऐसा मुमकिन नहीं 
आज के दौर में ये तो  मुमकिन नहीं 
आज के दौर में यूँ तो मुमकिन नहीं .. ऐसा कुछ ज़ुबान के साथ न्याय होगा ..
.
शख़्स जो हुक़्म देता रहा आज तक ... अब रदीफ़ का दोष हट गया.. बिना शब्द बदले..
.
ऐसे ही बारीक बिन्दुओं पर चिन्तन करते रहिये, रचते रहिये..
सादर 

Comment by सालिक गणवीर on October 30, 2020 at 2:51pm

आदरणीय समर कबीर साहिब
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी आमद और हौसला अफ़ज़ाई के लिये आपको तह -ए - दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। आपकी इस्लाह पर फौरन तामील कर रहा हूँ जनाब।

Comment by Samar kabeer on October 30, 2020 at 2:33pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'मैं चलूँ काश बच्चों की उंँगली पकड़ 
ये सफ़र ही सही आख़िरी हो मेरा'

उचित लगे तो शैर यूँ कर लें:-

'मैं चलूँ अपने बच्चों की उँगली पकड़

फिर भले ये सफ़र आख़िरी हो मेरा'

'वाक़िया होगा पहला यक़ीं मानिए'

इस मिसरे में 'वाक़िया' को "वाक़िआ" कर लें ।

'खाक कर दें चलो नफ़रतों का जहाँ
आग होगी तेरी और घी हो मेरा'

इस शैर को यूँ कहें:-

'ख़ाक ऐसे करें नफ़रतों का जहाँ

आग तेरी रहे और घी हो मेरा'

'ज़िंदगी को भी आना पड़ा सामने'

इस मिसरे में 'पड़ा' को "पड़े" कर लें ।

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