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मगर होता नहीं दिखता - गजल

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

जमीं पर बीज उल्फत के कोई बोता नहीं दिखता.

लगाता प्रेम सरिता में कोई गोता नहीं दिखता.

 

करे अपराध कोई और ही उसकी सजा पाए,

वो कहते हैं हुआ इंसाफ़, पर होता नहीं दिखता.

 

झरोखे हैं न आँगन है, न दाना है न गौरैया,

सुनाये राम का जो नाम वह तोता नहीं दिखता. 

 

सभी बेटों ने अपनी एक नई दुनिया बसा ली है,

कि अब दादी के’ हाथों में यहाँ पोता नहीं दिखता.

 

हुए जंगल नदारद सब, बचे बस ठूँठ पेड़ों के,

बुझा दे प्यास वन में जो कहीं सोता नहीं दिखता.

 

लुटे कोई पिटे कोई किसी को कुछ नहीं मतलब,

पराये दुख में अब कोई यहाँ रोता नहीं दिखता. 

 

यहाँ साहित्यकारों की यक़ीनन है बड़ी महफ़िल,

सभी अपनी सुनाते हैं कोई श्रोता नहीं दिखता.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 14, 2020 at 11:46am

आदरणीय Rachna Bhatia जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 14, 2020 at 11:45am

आदरणीय Samar kabeer जी सादर नमस्कार 

आपका आशीष मिला सादर नमन 

सुधार कर प्रस्तुत करता हूँ 

Comment by Rachna Bhatia on October 14, 2020 at 10:48am

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी बेहतरीन ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें।

Comment by Samar kabeer on October 13, 2020 at 8:36pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'जमीं साहित्यकारों की यहाँ पर खूब हैं महफ़िल'

इस मिसरे में 'जमीं' को "जमी" और 'हैं' को "है" कर लें ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 8, 2020 at 5:22pm

आदरणीय Nilesh Shevgaonkar जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसला अफजाई के लिए सादर नमन 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 7, 2020 at 9:06am

आ. बसंत जी,
तंग काफ़िये में अच्छी ग़ज़ल हुई है ..बधाई 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 5, 2020 at 8:07pm

जनाब अमीरुद्दीन 'अमीर' जी आदाब
आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया, इसी तरह स्नेह बनाये रखें सादर नमन

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 5, 2020 at 8:06pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार
आपकी हौसलाफजाई ही हमारा संबल है, सादर आभार

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 5, 2020 at 8:06pm

आदरणीय Chetan Prakash जी सादर नमस्कार
आपकी हौसलाफजाई से गदगद हूँ, सादर नमन आभार

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 5, 2020 at 7:19pm

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, उम्दा ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई प्रस्तुत है। सादर। 

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