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कश्ती में है मगर नहीं पतवार हाथ में- गजल

 221 2121 1221  212

कश्ती में है मगर नहीं पतवार हाथ में. 

होता कहाँ किसी के ये संसार हाथ में.

कर लो भला गरीब का कुर्सी पे बैठकर,

तुमको मिला है भाग्य से अधिकार हाथ में. 

ईश्वर की चाह है तो अकेले भजन करो,

रक्खो न आप धर्म का व्यापार हाथ में. 

दुनिया ये खाली हाथ सिकंदर ने छोड़ दी,

जाना सरल है ले के दुआ प्यार हाथ में.

मौसम कभी भी एक सा रहता नहीं यहाँ, 

है बाद में ‘बसंत’ के पतझार हाथ में.

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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