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गजल( कैसी आज करोना आई)

22 22 22 22

कैसी आज करोना आई
करते है सब राम दुहाई।
आना जाना बंद हुआ है,
हम घर में रहते बतिआई!
दाढ़ी मूंछ बना लेते हैं
सिर के बाल करें अगुआई।
बंद पड़े सैलून यहां के
रोता फिरता अकलू नाई।
डर के मारे दुबके हैं सब
नाई कहता, 'आओ भाई!
मास्क लगाकर मैं रहता हूं
तुम क्योंकर जाते खिसियाई?
मुंह ढको,फिर आ जाओ जी,
घर जाओ तुम बाल कटाई।
एक दिवस की बात नहीं यह
आगे बढ़ती और लड़ाई।
झाड़ू पोंछा,बर्तन बासन,
अपना कर,अपनी सुथराई।
वैक्सीन अगर कोई आए,
भागे कोरो ना हरजाई।'
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on May 28, 2020 at 7:08pm

आदरणीय अमीरुद्दीन जी,शुक्रिया एवं नमन।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 28, 2020 at 5:45pm

जनाब मनन कुमार जी, आदाब। अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Samar kabeer on May 28, 2020 at 2:46pm

इस जानकारी के लिए धन्यवाद।

Comment by Manan Kumar singh on May 28, 2020 at 2:28pm

आभार और नमन आदरणीय समर जी।मैंने नहीं बनाया करोना को स्त्रीलिंग,बल्कि हिंदी व्याकरण के नियमानुसार वह स्त्रीलिंग ही है; आकारांत शब्द।जानने की बात है।

Comment by Samar kabeer on May 28, 2020 at 2:02pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले में आपने 'करोना' को स्त्रीलिंग बना दिया:-)))

Comment by Manan Kumar singh on May 28, 2020 at 11:24am

आभार आदरणीय लक्ष्मण भाई,नमन।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 28, 2020 at 9:28am

आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

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