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खुश हुआ तू बोलकर....(गजल)

2122 2122 2122

खुश हुआ तू बोलकर,' है जानवर तू'

लग रहा खुद को बताता,बेसबर तू।
सांस बनकर बह रहीं ठंडी हवाएं
आग की लपटें उठा मत बन, कहर तू।
ख्वाब पाले  मौन बैठी हैं सदाएं
कानफाड़ू! ला सके तो,ला सहर तू?
तार होती हो नहीं उम्मीद कोई,
हो अगरचे तो बता,कोई पहर तू?
हर्फ हासिल हो गए तो शायरी कर,
क्यूं अंधेरों को बढ़ाता है बशर तू?
मत बिठा मेरी गजल को हाशिए पर
छटपटाती है बहर,देखे अगर तू।
रुक्न रोते, बुदबुदाते शब्द सारे,
नज़्म कहकर फेंकता कंकड़,मगर तू।
बंट सका पानी कभी क्या बावरी का?
प्रेम -धुन गाती लहर, बस मत मुकर तू।
तेल मिट्टी में मिला गढ्ढे बनाता,
बोलता मुंह फाड़कर,' इसमें उतर तू।'
जाल में खुद के फंसा बनकर मूषक क्यूं,
भाग ले बाहर जरा उसको कुतर तू।
" मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on May 25, 2020 at 11:34am

आपका दिली आभार आदरणीय छोटेलाल जी।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on May 25, 2020 at 9:09am

आदरणीय मनन कुमार जी बहुत ही शानदार गजल लिखने के लिए दिली मुबारकबाद कुबूल कीजिये

Comment by Manan Kumar singh on May 20, 2020 at 2:36pm

आपका तहे दिल से आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी।

Comment by TEJ VEER SINGH on May 20, 2020 at 12:03pm

हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी । बेहतरीन गज़ल।

हर्फ हासिल हो गए तो शायरी कर,
क्यूं अंधेरों को बढ़ाता है बशर तू?

Comment by Manan Kumar singh on May 19, 2020 at 2:14pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई,आपका बहुत बहुत आभारी हूं।गाहे - बेगाहे प्रयास चलता रहता है।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 19, 2020 at 2:10pm

आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Manan Kumar singh on May 18, 2020 at 7:29pm

देशकाल और वातावरण के अनुरूप जनाभिव्य क्ति को मुखर करते हुए प्रचलित शब्दों के व्यवहार को अज्ञता - विज्ञता की परिधि में संकुचित करना अपरिहार्य नहीं होना चाहिए।

Comment by Samar kabeer on May 18, 2020 at 6:20pm

//बेसबर और बहर जैसे शब्द अब अप्रचलित नहीं है,यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा।मेरे विचार में हमें अब इन चीजों को स्वीकार करना चाहिए//

ये शब्द उन्हीं लोगों के लिए प्रचलित हैं जो शब्दों का सहीह ज्ञान नहीं रखते,अन्यथा अधिकतर शाइर जो हिन्दी भाषी हैं,सहीह शब्द ही प्रयोग करते हैं,वैसे मेरा काम जानकारी देना है,इसे मानना या न मानना आपकी मर्ज़ी है ।

Comment by Manan Kumar singh on May 18, 2020 at 6:13pm

आभार और नमन आदरणीय समर जी।दूसरे शेर में उला में बहर में त्रुटि है। मैं उसमें चुप की जगह मौन कर दूंगा,मात्रा पूर्ण हो जाएगी।यह इंगित करने के लिए आपका आभार व्यक्त करता हूं। हां, बेसबर और बहर जैसे शब्द अब अप्रचलित नहीं है,यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा।मेरे विचार में हमें अब इन चीजों को स्वीकार करना चाहिए।

Comment by Manan Kumar singh on May 18, 2020 at 6:11pm

आभार और नमन आदरणीय समर जी।दूसरे शेर में उला में बहर में त्रुटि है। मैं उसमें चुप की जगह मौन के दूंगा,मात्रा पूर्ण हो जाएगी।यह इंगित करने के लिए आपका आभार व्यक्त करता हूं। हां, बेसबर और बहर जैसे शब्द अब अप्रचलित नहीं है,यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा।मेरे विचार में हमें अब इन चीजों को स्वीकार करना चाहिए।

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