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२२ २२ २२ २२ २२ २

आओगे जब भी तुम मेरे ख्वाबों में
उन लम्हो को रख लूँगी मैं यादों में

और नही कुछ चाहूँ तुमसे मेरी जां

दम टूटे मेरा बस तेरी बाहों में

मेरा जीवन इस गुलशन के फूलों जैसा

घिरा हुआ है मगर बहुत से काँटों में


तुमको में रूदाद सुनाऊं क्या अपनी
मेरा हर लम्हा बीता है आहों में

देख रही हो मुझको तुम जैसे "रौनक"
जी चाहे मैं डूब मरूँ इन आँखों में



मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mohammed Arif on September 24, 2017 at 7:53am
आदरणीया कल्पना भट्ट जी आदाब, बहुत ही अच्छी ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें । बाक़ी गुणीजनों के आने का इंतज़ार करें ।
Comment by AMIT on September 23, 2017 at 8:35pm
बेहतरीन ग़ज़ल
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 23, 2017 at 6:27pm

धन्यवाद आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी | 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 23, 2017 at 4:42pm

आदरणीया कल्पना जी रूमानी अहसास से भरी अच्छी ग़ज़ल हुयी है इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर

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