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पाँच चुनावी दोहे (संंख्या - 2) // --सौरभ

हर चूहा चालाक है, ढूँढे  सही  जहाज
डगमग दिखा जहाज ग़र, कूद भगे बिन लाज

सजी हाट में घूमती, बटमारों की जात
माल-लूट के पूर्व ही, करती लत्तमलात

नाटक के इस मंच पर, पीटे जोकर ढोल
उलटबासियाँ चेंपता, चीखे - ’खोला पोल’

भौंरों को उम्मीद थी, खिलें उपट के फूल
पर वो आँधी चल पड़ी, धूल धूल बस धूल

दर्शक भौंचक हो रहे, देख पात्र के टेक
उठा-पटक तो मंच पर, पर्दा पीछे एक

*******
-सौरभ
*******
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 25, 2014 at 12:01pm

सामयिक और सार्थक के साथ ही रुचिकर दोहे ! हार्दिक बधाई श्री सौरभ भाई जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 24, 2014 at 9:27pm

आदरणीय सौरभ सर बहुत सुंदर l वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर बहुत ही सार्थक दोहे कहे हैं बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 24, 2014 at 8:30pm

हर चूहा चालाक है, ढूँढे  सही  जहाज 
डगमग दिखा जहाज ग़र, कूद भगे बिन लाज 

वाह्ह वह्ह्ह्ह मजा आ गया दोहे पढ़ के सच में चुनावी माहौल में यही सब तो हो रहा है.बहुत- बहुत बधाई  इन शानदार दोहों के लिए| 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 24, 2014 at 2:35pm

आदरणीय राजेश मृदुजी, क्या सुन्दर वातावरण रच दिया आपने !

इन छंदों के मर्म में विद मलाइस टुवार्ड्स वन एण्ड ऑल  की तरंगें ही आलड़ित हैं. :-))

सादर आभार आदरणीय.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 24, 2014 at 2:32pm

रचना आपको रुचिकर लगी, मुझे भी बल मिला. हार्दिक धन्यवाद भाई जितेन्द्रजी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 24, 2014 at 2:31pm

सादर धन्यवाद आदरणीय गिरिराजभाईजी.

Comment by राजेश 'मृदु' on March 24, 2014 at 1:15pm

बहुत ही धांसू दोहे हैं, ऐसे दोहों को पढ़ने का अपना ही आनंद है । यह आनंद ठीक वैसा ही है जब आम के बागान में उस वक्‍त जाने से मिलता है जब मंजरियों की मिठास पत्‍तों पर निढाल पड़ी रहती है और पागल हवा उसे यहां-वहां ढूंढती थक कर घास पर लेट जाती है, सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 24, 2014 at 10:15am

चुनाव के सामने आते ही सभी नेता व् दल अपनी उधेड़-बुन में लग जाते है,  चुनाव नही हुआ मानो नौटंकी हो गयी. आपका एक -एक दोहा इस नाटक की पोल खोल रहा है , हार्दिक बधाई आपको आदरणीय सौरभ जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 24, 2014 at 9:57am

आदरणीय सौरभ भाई , सटीक चुनावी दोहों की रचना की है , बहुत बढ़िया , मज़ा आगया॥ बधाइयाँ ॥

नाटक के इस मंच पर, पाया जोकर रोल
उलटबासियाँ चेंप कर कहता ’खोला पोल’ -- बहुत पसन्द आया , ढेरों बधाइयाँ ॥ 

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