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प्रकृति हम सबकी माता है

सोच, समझ,सुन मेरे लाल

कभी अनादर इसका मत करना

वरना बन जाएगी काल

 

गिरना उठना और चल देना

तू स्वंय को रखना सदा संभाल

इतना भी आसाँ ना समझो

बनना सबके लिए मिसाल

 

सत्य व्रत का पालन करना

कभी किसी ना तू डरना

विपदाओं को मित्र बनाकर

बस थामे रहना ‘दीपमशाल

                                                              

मौलिक व अप्रकाशित

 

-प्रदीप देवीशरण भट्ट - हैदराबाद    03.12.2019

 

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 9, 2019 at 6:20am

आ. भाई प्रदीप जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on December 8, 2019 at 2:47pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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