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तरही गजल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122 / 2122 / 2122 /  212
**
उनका वादा राम का  वादा  समझ बैठे थे हम
हर सियासतदान को सच्चा समझ बैठे थे हम।१।
**
कह रहे थे सब  यहाँ  जम्हूरियत है इसलिए
देश में हर फैसला अपना समझ बैठे थे हम।२।
**
गढ़ गये पुरखे हमारे  बीच  मजहब नाम की
क्यों उसी दीवार को रस्ता समझ बैठे थे हम।३।
**
आस्तीनों  में  छिपे  विषधर  लगे  फुफकारने
यूँ जिन्हें जाँ से अधिक प्यारा समझ बैठे थे हम।४।
**
होश  आया  तो  ये  जाना  था  लुटेरे  ही  अधिक
जिस किसी महमान को अपना समझ बैठे थे हम।५।
**
हम कहें अब क्या भला जब कह गये हैं यूँ 'फिराक'
"इस ज़मीन ओ आसमाँ को क्या समझ बैठे थे हम"।६।
**
रफ्ता - रफ्ता  जान  पाये  हम  न  उसके  ख्वाब थे
खुद को जिसकी आँख का तारा समझ बैठे थे हम।७।
**
रूबरू  यूँ  हो  न  पाये  जब  तलक  अंगार से
हर धुएँ की भीड़ को जलना समझ बैठे थे हम।८।
**

मौलिक.अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by vijay nikore on March 7, 2020 at 5:45pm

आपकी गज़ल बहुत ही पसन्द आई। हार्दिक बधाई, मेरे मित्र लक्ष्मण जी।

Comment by Samar kabeer on February 24, 2020 at 3:50pm

//गढ़ गये पुरखे जो मजहब की हमारे बीच में'//

इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'बीच जिसके दफ़्न हैं पुरखे हमारे आज भी'

मज़हब का हवाला देने की ज़रूरत नहीं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 24, 2020 at 12:43pm

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और मार्गदर्शन के लिए आभार । 

इंगित मिसरे को इस प्रकार बदलने से भाव स्पष्ट हो रहा है या नहीं देखिऐगा..

"गढ़ गये पुरखे जो मजहब की हमारे बीच में'

Comment by Samar kabeer on February 23, 2020 at 7:43pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ओबीओ के तरही मिसरे पर दूसरी ग़ज़ल भी अच्छी हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

'गढ़ गये पुरखे हमारे  बीच  मजहब नाम की
क्यों उसी दीवार को रस्ता समझ बैठे थे हम'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं हुआ,ऊला मिसरा बदलने का प्रयास करें ।

'होश  आया  तो  ये  जाना  था  लुटेरे  ही  अधिक'

इस मिसरे में 'लुटेरे' की जगह "लुटेरा" करना उचित होगा ।

गिरह अच्छी लगी ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2020 at 6:26pm

आ. भाई रविभसीन जी, सादर अभिवादन । गजल को समय देने और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2020 at 6:24pm

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2020 at 6:21pm

आ. भाई दण्डपाणि जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद । 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on February 23, 2020 at 2:28pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई, इस सुन्दर ग़ज़ल की रचना पर आपकी ख़िदमत में अपनी दाद और मुबारक़बाद पेश करता हूँ। सादर...

Comment by TEJ VEER SINGH on February 23, 2020 at 1:47pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी।बेहतरीन गज़ल।

आस्तीनों  में  छिपे  विषधर  लगे  फुफकारने
यूँ जिन्हें जाँ से अधिक प्यारा समझ बैठे थे हम।४।

Comment by dandpani nahak on February 22, 2020 at 7:10pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर  जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है  हार्दिक बधाई स्वीकार करें  मतला  अच्छा हुआ है और सातवां शैर तो लाज़वाब हैं वाह क्या कहने बहुत बहुत बधाई 

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