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Er. Ganesh Jee "Bagi"'s Blog (111)

कविता : बारिश के रंग

हाल- ए- दिल ऊंचे महलों से पूछो जरा,

मस्तियाँ बादलों की कैसी उन्हे लगती हैं,



जब सावन की पहली पड़ती फुहार,

धरा ख़ुशी से सोंधी खुशबू बिखेरती,

बच्चे उछलते कूदते मचलते खेलते,

चेहरे किसानो के उम्मीदों से चमकते,



हाल- ए- दिल झोपड़ियो से पूछो जरा,

आंशु बन बारिश छपरों से टपकती है,



खूब बारिश हुई भरी नदिया और ताल ,

मचलती तितलियाँ भी आँचल संभाल,

हवाओं को भी देखो चलती मदभरी,

दीवाना बनाने को हमें हठ पर अड़ी,



हाल- ए- दिल उन… Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 10, 2010 at 2:30pm — 32 Comments

मेरी दूसरी ग़ज़ल

दो सीधे से सवाल का जवाब दोस्तों ,

क्यों पी रही है मुझको ये शराब दोस्तों ,



मैने शराब पी थी गम भुलाने के लिए

बढ़ने लगी है क्यों मेरी अजाब दोस्तों,



माना कि पी गया मै जश्ने यार मे बहुत ,

डर है जिगर न दे कहीं जवाब दोस्तों ,



इतनी ही गर हसीं है ये प्याले की महेबुबा,

फिर क्यों मिला रहे सुरा में आब दोस्तों,



मैने जवानी जाम संग बितायी शान से,

चर्चा हुई बुढ़ापे की ख़राब दोस्तों ,



कितनी ही मिन्नतों के बाद जिंदगी मिली,

ना… Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 7, 2010 at 1:00am — 27 Comments

सदन खड़ी द्रोपदी बनकर...

कौरव पांडव मिल चीर खीचते ,

सदन खड़ी बेचारी द्रोपदी बनकर,

हाथ जोड़े लुट रही थी वो अबला,

कृष्ण ना दिखे किसी के अन्दर ,



चुनाव का चौपड़ है बिछने वाला ,

शकुनी चलेगा चाल,पासे फेककर,

खेलेंगे खेल दुर्योधन दुश्शाशन ,

होगा खड़ा शिखंडी भेष बदलकर,



हे!जनता जनार्दन अब तो जागो,

रक्षा करो कृष्ण तुम बनकर,

दिखाओ,तुम्हे भी आती है बचानी आबरू ,

"बागी" नहीं जीना शकुनी का पासा बनकर,…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 21, 2010 at 8:00pm — 22 Comments

मैं घबरा जाता हूँ...

मैं घबरा जाता हूँ यह सोच सोच कर ,
कैसे कोई गरीब अपना घर चलाता होगा,

सौ लाता है मजदूर पूरे दिन मर कर,
कैसे भर पेट दाल रोटी खा पाता होगा,

बीमार मर जायेगा दवा का दाम सुनकर,
हे! ईश्वर कैसे वो ईलाज कराता होगा,

मुर्दा डर जायेगा लकड़ी की दर सुनकर,
कैसे कोई मजलूम शव जलाता होगा ,

लगी है आग गंगा में महंगाई की "बागी",
कैसे कोई अधनंगा डुबकी लगाता होगा ,

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 17, 2010 at 3:00pm — 16 Comments

पहली ग़ज़ल

वो इक अलाव सा जिगर में लिए फिरते हैं ,

चिराग महल के झोपडी के खूँ से जलते हैं !



बंद भारत ने ठंडे कर दिए चूल्हे लाखों ,

है किस तरह की जंग रहनुमा जो लड़ते हैं



रोटियां सेंकते लाशों पे आपने लालच की,

ये कर्णधार मुझे तो जल्लाद लगते हैं !



वो ढूँढते है भगवान को मंदिर की ओट से,

हमारी आस्था ऐसी जो चक्की भी पूजते हैं !



अपना जाना जो उन्हें जान जाएगी "बागी"

वो ज़हरी नाग हैं जो आस्तीं में रहते है !



( मैं आदरणीय योगराज प्रभाकर जी ,… Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 10, 2010 at 11:30pm — 10 Comments

"बाल मजदूरी ठीक नहीं"

चाय पिला पिला कर ,

लोगो की सेवा वो करता रहा,

महज़ चार चाय की कीमत पर ,

मालिक उसको छलता रहा,

भूखी अंतड़िया ,

क्या जाने चाय की तलब ,

दो रोटियां, चोखे संग,

पाने को पेट जलता रहा ,

बैठे चायखाने मे

खादी पहने

कुछ उच्च शिक्षित लोगों के मध्य

"बाल मजदूरी…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 12, 2010 at 3:00pm — 27 Comments

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के कुछ सदस्यो का मिलन पटना के पवित्र महावीर मंदिर के प्रांगण मे,

आज दिनांक 02/06/2010 को ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के कुछ सदस्यो का मिलन पटना के पवित्र महावीर मंदिर के प्रांगण मे हुआ, जिसका चित्र यहाँ देखा जा सकता है |

पटना के पवित्र महावीर मंदिर



रवि कुमार "गुरु" और सतीश मापतपुरी जी



गनेश जी "बागी", रवि कुमार "गुरु" और सतीश मापतपुरी जी…



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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 2, 2010 at 10:32pm — 6 Comments

तुम गोली चलाते आ जाओ, हम तो गले लगाने बैठे है

तुम गोली चलाते आ जाओ, हम तो गले लगाने बैठे है,

तुम रक्त पात करते रहो, हम अपना लहू बहाने बैठे है,



तुम हिंसा को ही धरम मानते,हम अहिंसा के मतवाले है,

तुम दोनों गालो पर मारते रहो,हम तो गाँधी को मानने वाले है,

हर बार पीठ पर तुमने वार किया, फिर भी हम सीना ताने बैठे है,

तुम गोली चलाते आ जाओ, हम तो गले लगाने बैठे है,



तुम पडोसी धरम निभा न सके, हम भाई धरम निभाते है,

तुम फ़ौरन हमला कर देते, जब हम वार्ता के लिये बुलाते है,

तुम नफरत की आग उगलते हो,हम…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 8, 2010 at 10:30am — 16 Comments

-माई तनिक बतावS मोहे, का हो गईल हमसे कसूर.

आज रात के बात, पुरी तरह से बावे याद,

एक छोटी सी,नन्ही सी, प्यारी सी गुड़िया,

करत रहल बहुत ही कातर गुहार,

माई तनिक बतावS मोहे, का हो गईल हमसे कसूर,

दुनिया मे आवे से पहिले, कईल चाहेलू तू अपना से दूर,



तोहरे खून से सिचिंत बानी, तोहरे हई हम त अंश,

अपने हाथ से अपना के मिटा के, कईसे सहबू इ पाप के दंश,

अपने से ही बनावल गुड़िया, कईसे देबू हपने से तूर,

माई तनिक बतावS मोहे, का हो गईल हमसे कसूर,

दुनिया मे आवे से पहिले, कईल चाहेलू तू अपना से दूर,…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 30, 2010 at 2:30pm — 7 Comments

साधु बन बोले राम राम

जिन्दगी आधी बीत गई,

कभी न किया धर्म का काम,

पूलिस पिछे जब पड़ी तो,

साधु बन बोले राम राम,



लूट मार, चोरी डकैती,

किये बहुत कुकर्म मे नाम,

सभी पाप छिप गया,

जनता पूजे अब सुबह शाम,



जनता पूजे सुबह शाम,

अब मजा ही मजा है,

पहले पुलिस से छुप के,

करना पड़ता था गन्दा काम,

अब नेता पुलिस करते रखवाली,

खुब है ऐशोआराम,



खुब है ऐशोआराम,

आप भी बाबा के बन…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 11, 2010 at 7:00am — 1 Comment

मेरी नादानी

मेरी पहली कविता जो मैने १९९६ मे लिखी थी  .....





भूली मुहब्बत की दास्तान हो तुम ,
जहाँ सूरज चाँद सितारे न हो…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 9, 2010 at 9:00am — 1 Comment

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