वक़्त मिलता है कहाँ
आज के मौसुल में
रक़ीबा दर - ब - दर
डोलने का हुनर मंद है
ये ख़ाक सार
इक अदद पेट ही है
जिसने न जाने कितनी
जिंदगियां लीली है
तुखंम उस पर कभी भरता नहीं
हर वक्त सुरसा सा
मुँह खोल के रखता है
न जाने किस कदर
इसमें ख़ज़ीली हैं।
ईंते ख़ाबां मुलम्मा कौन सा
इस पर चढ़ा होगा
दिखाई भी तो नहीं देता
मगर इक बात मुझको
इसके जानिब ये ज़रुर कहनी है।
अगरचे ये नहीं होता
बा कसम ये दुनिया नहीं होती
ये जो…
Added by DR ARUN KUMAR SHASTRI on February 2, 2021 at 4:30pm — No Comments
रिश्तों में दूरी
जब से मैंने अपने दोस्त को
सूरज के बड़े होकर भी छोटे लगने में
धरती से उसकी दूरी की भूमिका समझाई है
बड़ा दिखने के लिए कद बढाने की जगह
दोस्त मुझसे लगातार दूरियां बढ़ा रहा है
ताकि मैं मान लूं वो बृहत् आकार पा रहा है
पर दूरी के कारन छोटा नजर आ रहा है
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Dr Ashutosh Mishra on September 29, 2018 at 10:55am — 6 Comments
आदमी और नदी
पहाड़ों से निकलतीं थीं झूम-झूम कर
खो जाती थीं एक-दुसरे में घूम-घूम कर
विशद् धारा बन जाती थी
एक नदी कहलाती थी
समुंदर में जाकर प्रेम करती सुरूप
हो जाती एकरूप |
आदमी भी कुछ ऐसा था
स्वीकारता दुसरे को
चाहे दूसरा जैसा था
आदमी होना प्रथम था
बाद में ज़मीन-पैसा था |
आदमी का मेल-मिलाप /सभ्यता रचता था
इसी तरह एक राज्य/एक देश बसता था |
बाद में नदी को जरूरत के…
ContinueAdded by somesh kumar on March 7, 2018 at 8:00pm — 3 Comments
खोया बच्चा
हिन्दू घर से खोया बच्चा
माँ मम्मी कह रोया बच्चा
गुरूद्वारे का लंगर छक कर
मस्जिद में जा सोया बच्चा |
गली मोहल्ला ढूंढ रहा था
उसकों घर घर थाने थाने
दीवारें सब हाँफ रहीं थीं
नींव लगी थी उन्हें बचाने |
खुली नींद फिर वो भागा
एक पग में दस डग नापा
थक हार देखी एक बस्ती
निकली चर्च से हँसती अंटी |
“तुम शायद घर भूल गया है !
चलों तुम्हें घर से…
ContinueAdded by somesh kumar on March 4, 2018 at 2:00pm — 4 Comments
आउट ऑफ़ कवरेज़
साथ-साथ बैठे हैं और दूर कहीं इंगेज हैं
4जी के दौर में घर आउट ऑफ़ कवरेज़ है |
लाइक है पॉक है ट्रेल है जोक् है ना कोई रोक है
बैठे-बैठे सारी दुनिया मुट्ठी में कर लेने का क्रेज़ है |
अंधी दौड़ है या भेड़ो का दौर है किसे किसका गौर है
अस्मिता की लड़ाई ना मालूम कौन रियल कौन फ़ेक है |
सोमेश कुमार(मौलिक एवं अप्रकाशित )
Added by somesh kumar on December 24, 2017 at 10:15pm — 5 Comments
मछली और दाँत
अचानक ! बरसात आती है
सड़क चलती लड़की
भीग जाती है |
एक्वेरियम की छोटी रंगीन
मछली तैर-तैर के
मन रीझ जाती है ||
x x x x x x x x
देखता हूँ टकटकी लगाए
जब तक ना होती ओझल |
“दाना-दाना-दाना-दाना”
उकसाता पुरुष मन चंचल ||
x x x x x x x x x x
बेटी सहसा आ,छेड़ देती बात
हमले से,काँप उठता है गात |
और मैं देखता हूँ छोटी मछली
और बढ़ते हुए बड़े-बड़े दाँत ||
सोमेश कुमार(मौलिक…
ContinueAdded by somesh kumar on June 16, 2017 at 2:48pm — 1 Comment
कलम मेरी खामोश नहीं, ये लिखती नई कहानी है।
इसमें स्याही के बदले मेरी, आंखों वाला पानी है।।
सृजन की सरिता इससे बहती
झूठ नहीं ये सच है कहती।
जीवन के हर सुख-दुख में ये,…
ContinueAdded by Pradeep Bahuguna Darpan on September 22, 2016 at 10:30am — 4 Comments
वो मुझे याद है, उसने भुला दिया मुझको
आज की रात फिर उसने रुला दिया मुझको,
ये बताओ कि आजकल हो किसके साथ सनम
किसी को ना मिले, जैसा सिला दिया मुझको।
रुह तो मर गई लेकिन, शरीर जिंदा है
जहर वो कौन सा तुमने पिला दिया मुझको।
हमने उस शख्स को बरसों से नहीं देखा था
उसी की याद ने उससे मिला दिया मुझको।
वो तो कहती थी, उसके दिल का शहंशाह है अतुल
है करम उसको ये, शायर बना दिया मुझको।।
…
Added by atul kushwah on February 18, 2014 at 10:30pm — 3 Comments
पहले मौत दे, फिर जिंदगानी कौन देता है
मुकम्मल हो सके ऐसी कहानी कौन देता है,
यहां तालाब और नदियां कई बरसों से सूखी हैं
खुदा जाने कि पीने को ये पानी कौन देता है,
हमें तो जिंदगी ठहरी हुई इक झील लगती है
मगर हर वक्त दरिया को रवानी कौन देता है,
जमीं से आसमां तक का सफर हम कर चुके लेकिन
नहीं मालूम मंजिल की निशानी कौन देता है,
परिंदे जानते हैं ये कि पर कटने का खतरा है
इन्हें फिर हौसला ये आसमानी कौन देता…
Added by atul kushwah on January 17, 2014 at 9:30pm — 15 Comments
तेरे अधरों की मुस्कान,
भरती मेरे तन में प्राण.
जीवन की ऊर्जा हो तुम,
साँसों की सरगम की तान.
मैं सीप तुम मेरा मोती ,
मैं दीपक तुम मेरी ज्योति.
कभी पूर्ण न मैं हो पाता ,
संग मेरे जो…
ContinueAdded by Pradeep Bahuguna Darpan on June 30, 2013 at 9:00am — 20 Comments
ज़रूरी नहीं
कि हम पीटें ढिंढोरा
कि हम अच्छे दोस्त हैं
कि हमें आपस में प्यार है
कि हम पडोसी भी हैं
कि हमारे साझा रस्मो-रिवाज़ हैं
कि हमारी मिली-जुली विरासतें हैं
कतई ज़रूरी नहीं है ये
कि हम दुनिया के सामने
अपने प्यार का इज़हार करें
क्योंकि जब दोस्ती टूटती है
जब प्यार नफरत में बदलता है
तब रिश्तों में खटास आती है
तब दिल टूट जाते हैं
तब अकबका जाते हैं वे लोग
जिनके दिल मोम हैं
जो…
ContinueAdded by anwar suhail on March 10, 2013 at 7:24pm — 8 Comments
क्यों मिल गयी संतुष्टि
उन्मुक्त उड़ान भरने की
जो रौंध देते हो पग में
उसे रोते , कराहते
फिर भी मूर्त बन
सहन करना मज़बूरी है
क्या कोई सह पाता है रौंदा जाना ???
वो हवा जो गिरा देती है
टहनियों से उन पत्तियों को
जो बिखर जाती हैं यहाँ वहाँ
और तुम्हारे द्वारा रौंधा जाना
स्वीकार नहीं उन्हें
तकलीफ होती है
क्या खुश होता है कोई
रौंधे जाने से ??
शायद नहीं
बस सहती हैं और
वो तल्लीनता…
ContinueAdded by deepti sharma on February 13, 2013 at 9:26pm — 15 Comments
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