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Vijay nikore's Blog (212)

प्रकृति-सत्य

प्रकृति-सत्य

मेरे पिछवाड़े के पेड़ों के पत्ते

पतझर में अब पीले नहीं होते

ऋतु परिवर्तन से पहले ही, डरे-डरे

तन-मन हारे मारे-मारे उढ़ते फिरते

कि जैसे यह अकुलाते पत्ते नहीं हैं

हज़ारों घायल पक्षी…

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Added by vijay nikore on January 13, 2020 at 8:00am — 4 Comments

नियति-निर्माण

नियति-निर्माण

नियति मेरी, पूछूँ एक सवाल 

इतना तो बता दो मुझको

वास्तव में यह हिंसक नहीं है क्या

घोर अन्याय नहीं है क्या ...

कि हाथों में तुम्हारे रही है हमेशा

मेरे भविष्य की डोर

और मैं ...

ज़िन्दगी की इमारत की

किसी भी मंज़िल पर पहुँचा तो जाना

जागते सोचते हर धूलभरे कमरे में पाया

उदासीन खालीपन

और मेरी छाती में रहीं गिरफ़्तार

कितने अधबने अनबुने नामहीन

सनातन…

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Added by vijay nikore on January 9, 2020 at 9:30pm — 4 Comments

स्वप्न-मिलन

स्वप्न-मिलन

रात ... कल रात

कटने-पिटने के बावजूद

बड़ी देर तक उपस्थित रही

नींद के धुँधलके एकान्त में

पिघलते मोम-सा

कोई परिचित सलोना सपना बना…

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Added by vijay nikore on January 7, 2020 at 6:30am — 8 Comments

तुम न आना ...

ज़िन्दगी सपेरे की रहस्यमयी पिटारी हो मानो

नागिन-सी सोच की भटकती हुई गलियों में

हर रिश्ते की कमल-पंखुरी मुरझा कर

सूखकर भी झड़ जाने से पहले लिख जाती है

विचार-भाव में कोई लम्बी भीषण कहानी

अद्भुत है सृष्टि हर रिश्ते की

कभी किसी आकाशीय स्नेह से द्रवित

कभी परिवर्तित हृदय-संबंध से आतंकित

तारिकायों के संग नृत्य में प्र्फुल्लित

या कभी शून्य की सियाह सुरंग से उद्विग्न

पल भर में कहाँ से कहाँ घूम आता है…

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Added by vijay nikore on December 13, 2019 at 7:58am — 14 Comments

आशंका के कगार

आशंका  के  कगार

जानता हूँ

हर पिघलती सचाई में

फीकी सचाई के पार

कुछ झुठाई भी है

तभी तो आशंका की परतों के बीच

किसी भी परिस्थिति को परखते

किसी का झूठ जानते हुए भी

सचाई की लाश को मानो

थपकियाँ देते

कभी खिड़की का शीशा

कभी मन काआईना

कोना-कोना साफ़ करते

खिसक जाते हैं दिन

ज़िन्दगी हाथ फैलाए

मांगती है…

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Added by vijay nikore on November 17, 2019 at 6:12pm — 7 Comments

धूल का परदा

ठण्डी गहरी चाँदनी

चिंताओं की पहचानी

काल-पीड़ित

अफ़सोस-भरी आवाज़ें ...

पेड़ों से उलझी रोशनी को

पत्तों की धब्बों-सी परछाई से 

प्रथक करते

अब महसूस यह होता है

सपनों में

सपनों की सपनों से बातें ही तो थीं

हमारा प्यार

या उभरता-काँपता

धूल का परदा था क्या

विश्वासों में पला हमारा प्यार

आईं

व्यथाओं की ज़रा-सी हवाएँ

धूल के परदे में झोल न पड़ी

वह तो यहाँ वहाँ

कण-कण जानें…

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Added by vijay nikore on November 4, 2019 at 5:15pm — 12 Comments

चिन्तन-प्रश्न

चिन्तन-प्रश्न

आस्था की अनवस्थ रग को सहलाते

सचाई के अब भयावने-हुए मुख पर

उलझनों के ताल के उस पार उतर कर

अचानक यह कैसा उठा प्रश्नों का चक्रवात

चिंता की हवाओं का मंडराता विस्तार

एकाएक

यह क्या हुआ ?

कैसा खतरनाक है यह

सतही ज़िन्दगी का सतही स्तर

बाहरी चीख-चिल्लाहट 

सुनाई नहीं देता है आत्मा का स्वर

ऐसे में असहज है कितना

द्वंद्व-स्थिति में संकल्प-शक्ति से

किसी भी…

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Added by vijay nikore on October 25, 2019 at 1:22pm — 4 Comments

स्वप्न-सृष्टि

 स्वप्न-सृष्टि

 

बुझते  दिन  का  सहारा  बनी 

गहन  गंभीर  अभागी  शाम

मन  में  अब  अपने  ही  पुराने  घाव  की

मौन  वेदना  की  गुथियाँ  समेटती

बूँद-बूँद  गलती

पहले  स्वयं  सरकती-सी  रात  की ओर

अंधेरा  होते  ही  फिर  घसीट लेती  है  रात

बेरहमी  से अपनी काली कोठरी  में …

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Added by vijay nikore on October 15, 2019 at 4:30am — 2 Comments

ज़िन्दगी का वह हिस्सा

अनपेक्षित तज्रिबों को  लीलती हुई

मन में सहसा उठते घिरते

उलझी रस्सी-से खयालों को ठेलती

गलियाँ पार करती  चली आती थी तुम

तब साथ तुम्हारा था

साहस हमारा

तुम्हारी मनोहर महक

थी दमकती हवाओं का उत्साह

और तुम्हारे चेहरे की चमक 

थी हमारी शाम की अजब रोशनी

और मैं ...

तुम्हारी बातें सुनते नहीं थकता था

हँसी के पट्टे पर कूदते-खेलते

बीच हमारे कोई सरहदें

सीमाएँ न थीं

समय के पल्लू में…

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Added by vijay nikore on October 14, 2019 at 9:23am — 8 Comments

गहन अँधेरे में

रात-अँधेरे सारी रात

टटोलते कोई एक शब्द

स्वयं में स्माविष्ट कर ले 

जो तुम्हारे आने का उल्लास

चले जाने का विषाद

कभी बूँद-बूँद में लुप्त होती

खिलखिलाती रंग-बिरंगी हँसी

और प्यारी हिचकियाँ तुम्हारी

आँसू ढुलकाती, मेरी ओर ताकती

दीप-माला-सी तुम्हारी आँखें

कि मोहनिद्रा में जैसे

मेरे ओठों पर तुम

अपने शब्दों को खोज रही हो

यह प्रासंगकि नहीं है क्या

कि मैं रात-अँधेरे सारी रात

टटोल रहा…

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Added by vijay nikore on October 1, 2019 at 3:30pm — 8 Comments

आत्मा की आहट

कितने "अपने"

पहचाने थे यही रास्ते

पेड़ों की छाँह ओढ़े

कुहनी टेक

सरक जाते थे कितने

अच्छे-बुरे तजुर्बे

अचानक

चौंक जाती थी शाम

"मुझको घर जाना है"

तुम्हारे अरुणिम ललाट पर

अकस्मात चिंता की छायाएँ

और फिर ...

और फिर देख 

मेरी आँखों में अपनी आँखों की चमक

तुम्हारा ही मन नहीं करता था 

हाथ छोड़ चले जाने को

कि मानो जाते-जाते रुक जाती थी शाम

एक "और" आज के प्रेम-पत्र…

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Added by vijay nikore on September 30, 2019 at 10:22pm — 6 Comments

अन्तस्तल

भीतर तुम्हारे

है एक बहुत बड़ा कमरा

मानो वहीं है संसार तुम्हारा

वेदना, अतृप्ति, विरह और विषमता

काले-काले मेघ और दुखद ठहराव

इन सब से भरा यह कमरा बुलाता है तुमको

जानती हूँ यह भी कि इस कमरे से तुम्हारा

रहा है बहुत पुराना गहरा गोपनीय रिश्ता  

इस आभासी दुनिया के मिथ्यात्व से दूर होने को

तुम कभी भी किसी भी पल धीरे हलके-हलके

अपराध-भाव-ग्रस्त मानों फांसी के फंदे पर झूलते

बिना कुछ बोले उस कमरे में जब भी…

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Added by vijay nikore on September 16, 2019 at 9:39am — 6 Comments

निस्सम्बन्ध

पूर्तिहीन संवाद

आकुलित असंवेदित भाव

अपाहिज हुई वह जो होती थी

स्नेह की अपेक्षित शाम

गई कहाँ वह ममतामयी प्रतीक्षातुर बाहें

दिशायों से आती तुम्हारे आने की आहट

ऊब गई है, उकता गई है कब से

नपुंसक दुखजनित अजनबी हुई आस्था

महिमामयी स्मृतियों के आस-पास

मटमैली रौशनी सुनसान गहरी उदास

फिर क्यूँ जोड़ती हैं हमें देहहीन परछाइयाँ                   

आसाधारण अपूर्ण प्रवाही दिशाहीन हवा-सी

कसकती…

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Added by vijay nikore on September 8, 2019 at 3:58pm — 2 Comments

संबंध-सूत्र

अजीब अवस्था है

कोई खुरदरी विवशता है

और है अद्भुत  चित्ताकर्षण ....

पलकों के आसपास 

गहन दूरता का आवरण

कि  जैसे  हो  फैल  रहा

मूर्छा का मौन वातावरण

अपरिचित भीड़ में खो गईं 

कितनी  परिचित  संज्ञाएँ

सरोवर-सदृश  संवेदनाएँ

फिर  भी  न  जाने  कैसे

दरिद्र हुई धड़कन में भी आदतन

कोई वादा निभाने के बहाने ही शायद

डरी  हुई  बाहें  फैलाए

व्याकुलतर  गति  से  छू  लेती  हैं

आज भी…

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Added by vijay nikore on September 3, 2019 at 7:27am — 4 Comments

संबंधों का जाल

अचानक अजीब मनोदशा

अँधेरी हो रही हैं धुँधली आँखें

कुछ नहीं जानता मैं अब भँवर में

कुछ भी नहीं पहचानता हूँ अंत में

यह निसत्बध्ता, यह काया

एकाकार हो रहे हैं  क्या ?

 

साथ बंधी आ रही हैं  कभी  की

रात देर तक करी हमारी बातें

समुद्र की लहर-सी छलकती

अमृत के झरनों-सी हम दोनों की हँसी

आँखों में  ठहरे कभी के अनुच्चरित प्रश्न

पल में तुम्हारा परिचित चिंता में डूब जाना

उफ़्फ़.. इतने वर्षों के बाद भी वही है…

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Added by vijay nikore on August 8, 2019 at 6:14pm — 8 Comments

अनसुने अनकहे के बीच

कहे-अनसुने-से रहे कुछ जज़्बात

उसपर अनकहे एहसासों का भार

अजीब-सी बेचैन बेकाबू धड़कन का

तकलीफ़-भरा भयानक शोर ...

पन्नों पर उतर तो आते हैं यह

पर भरमाया घबराया मन

इनकार भरा

भार कोई हल्का नहीं होता

पगलाई अन्दरूनी हवाएँ

खयालों-सी वेगवान

झकझोरती आसमानी तूफ़ान बनी

लफ़्ज़ों से लफ़्ज़ टकराते

सूखे पेड़ों-से छूटे पत्तों की तरह

आढ़ी-टेढ़ी लकीरों को बेतहाशा समेटते

लुढ़क जाती है स्याही

रात अँधेरी…

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Added by vijay nikore on August 5, 2019 at 7:52am — 6 Comments

उलझा-सा सवाल

जाड़े की सुबह का ठिठुरता कोहरा

या हो ग्रीश्म की तपती धूप की तड़पन

अलसाए खड़े पेड़ की परछाईं ले अंगड़ाई

या आए पुरवाई हवा लिए वसन्ती बयार

उमड़-उमड़ आता है नभ में नम घटा-सा

तुम्झारी झरती आँखों में मेरे प्रति प्रतिपल

धड़कन में बसा लहराता वह पागल प्यार

इस पर भी, प्रिय, आता है खयाल

फूल कितने ही विकसित हों आँगन में

पर हो आँगन अगर बित्ता-भर उदास

छू ले सदूर शहनाई की वेदना का विस्तार

तो…

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Added by vijay nikore on July 29, 2019 at 2:49am — 4 Comments

प्रश्न-गुंथन

उर-विदारक उलझन

बर्फ़ीला एहसास

गूँजता-काँपता

एक सवाल

तुम्हा्रा स्नेह भरा संवेदित हृदय 

सुनता तो हूँ उसमें नित्य  नि:सन्देह

संगीत-सी तरंगित अपनी-सी धड़कन

फिर क्यूँ  तुम्हारे आने के बाद

मन के तंग घेरों में लगातार

सिर उठाए ठहरा रहता है हवा में

आदतन एक ख़याल 

एक अंगारी सवाल --

शीशे के गिलास का

हाथ से छूट जाना

तुम्हारे लिए

सामान्य तो नहीं है न ?

       …

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Added by vijay nikore on July 22, 2019 at 7:08am — 4 Comments

एक और खंडहर

स्मृतियाँ आजकल

आए-गए अचानक

कांच के टुकड़ों-सी

बिखरी

चुभती

छोटी-से-छोटी घटना भी

हिलोर देती है हृदय-तल को

हँसी डूब जाती है

नई सृष्टि ...

नए संबंध आते हैं

पर अब दिन का प्रकाश

सहा नहीं जाता

सूर्योदय से पहले ही जैसे

हम बुला लेते हैं शाम

मंडराते रह जाते हैं पतंगों की तरह

प्यार के कुछ शब्द

धुंधले वातावरण में भीतर

नए प्यार के आकार की रेखाएँ

स्पष्ट नहीं…

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Added by vijay nikore on July 21, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

गाड़ी स्टेशन छोड़ रही है

कण-कण, क्षण-क्षण

मिटती घुटती शाम से जुड़ती

स्वयँ को सांझ से पहले समेट रही

विलुप्त होती अवशेष रोशनी

प्रस्थान करते इंजिन के धुएँ-सी ...

दिन की साँस है अब जा रही

 

मृत्यु, अब तू अपना मुखौटा उतार दे

 

हमारे बीच के वह कितने वर्ष

जैसे बीते ही नहीं

कैसी असाधारणता है यह

कैसी है यह अंतिम विदा

मैं तुम्हें याद नहीं कर रहा

तू कहती थी न

“ याद तो तब करते हैं

जब भूले हों किसी को…

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Added by vijay nikore on July 17, 2019 at 4:56pm — 4 Comments

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