For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Vijay nikore's Blog (213)

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा

आँधी में पेड़ों से पत्तों का गिरना

पेड़ों की शाख़ों के टूटे हुए खण्ड गिनना

उड़ते बिखरे पत्तों से आंगन भर जाना

यह नज़ारा कोई नया नहीं है

फिर भी लगता है हर आँधी के बाद

नदियों पार “हमारे” उस पुल को चूमकर  आई

यह आँधी मुझसे कुछ बोल गई

गिरे पत्तों की पीड़ा मुझमें कुछ घोल गई

हर आँधी की पहचान अलग, फैलाव नया-सा

कि जैसे अब की आँधी में नि:संदेह

कुलबुलाहट नई है, कोलाहल कुछ और है

मेरी ही गलती है हर गति…

Continue

Added by vijay nikore on January 17, 2020 at 2:30pm — 4 Comments

प्रकृति-सत्य

प्रकृति-सत्य

मेरे पिछवाड़े के पेड़ों के पत्ते

पतझर में अब पीले नहीं होते

ऋतु परिवर्तन से पहले ही, डरे-डरे

तन-मन हारे मारे-मारे उढ़ते फिरते

कि जैसे यह अकुलाते पत्ते नहीं हैं

हज़ारों घायल पक्षी…

Continue

Added by vijay nikore on January 13, 2020 at 8:00am — 4 Comments

नियति-निर्माण

नियति-निर्माण

नियति मेरी, पूछूँ एक सवाल 

इतना तो बता दो मुझको

वास्तव में यह हिंसक नहीं है क्या

घोर अन्याय नहीं है क्या ...

कि हाथों में तुम्हारे रही है हमेशा

मेरे भविष्य की डोर

और मैं ...

ज़िन्दगी की इमारत की

किसी भी मंज़िल पर पहुँचा तो जाना

जागते सोचते हर धूलभरे कमरे में पाया

उदासीन खालीपन

और मेरी छाती में रहीं गिरफ़्तार

कितने अधबने अनबुने नामहीन

सनातन…

Continue

Added by vijay nikore on January 9, 2020 at 9:30pm — 4 Comments

स्वप्न-मिलन

स्वप्न-मिलन

रात ... कल रात

कटने-पिटने के बावजूद

बड़ी देर तक उपस्थित रही

नींद के धुँधलके एकान्त में

पिघलते मोम-सा

कोई परिचित सलोना सपना बना…

Continue

Added by vijay nikore on January 7, 2020 at 6:30am — 8 Comments

तुम न आना ...

ज़िन्दगी सपेरे की रहस्यमयी पिटारी हो मानो

नागिन-सी सोच की भटकती हुई गलियों में

हर रिश्ते की कमल-पंखुरी मुरझा कर

सूखकर भी झड़ जाने से पहले लिख जाती है

विचार-भाव में कोई लम्बी भीषण कहानी

अद्भुत है सृष्टि हर रिश्ते की

कभी किसी आकाशीय स्नेह से द्रवित

कभी परिवर्तित हृदय-संबंध से आतंकित

तारिकायों के संग नृत्य में प्र्फुल्लित

या कभी शून्य की सियाह सुरंग से उद्विग्न

पल भर में कहाँ से कहाँ घूम आता है…

Continue

Added by vijay nikore on December 13, 2019 at 7:58am — 14 Comments

आशंका के कगार

आशंका  के  कगार

जानता हूँ

हर पिघलती सचाई में

फीकी सचाई के पार

कुछ झुठाई भी है

तभी तो आशंका की परतों के बीच

किसी भी परिस्थिति को परखते

किसी का झूठ जानते हुए भी

सचाई की लाश को मानो

थपकियाँ देते

कभी खिड़की का शीशा

कभी मन काआईना

कोना-कोना साफ़ करते

खिसक जाते हैं दिन

ज़िन्दगी हाथ फैलाए

मांगती है…

Continue

Added by vijay nikore on November 17, 2019 at 6:12pm — 7 Comments

धूल का परदा

ठण्डी गहरी चाँदनी

चिंताओं की पहचानी

काल-पीड़ित

अफ़सोस-भरी आवाज़ें ...

पेड़ों से उलझी रोशनी को

पत्तों की धब्बों-सी परछाई से 

प्रथक करते

अब महसूस यह होता है

सपनों में

सपनों की सपनों से बातें ही तो थीं

हमारा प्यार

या उभरता-काँपता

धूल का परदा था क्या

विश्वासों में पला हमारा प्यार

आईं

व्यथाओं की ज़रा-सी हवाएँ

धूल के परदे में झोल न पड़ी

वह तो यहाँ वहाँ

कण-कण जानें…

Continue

Added by vijay nikore on November 4, 2019 at 5:15pm — 12 Comments

चिन्तन-प्रश्न

चिन्तन-प्रश्न

आस्था की अनवस्थ रग को सहलाते

सचाई के अब भयावने-हुए मुख पर

उलझनों के ताल के उस पार उतर कर

अचानक यह कैसा उठा प्रश्नों का चक्रवात

चिंता की हवाओं का मंडराता विस्तार

एकाएक

यह क्या हुआ ?

कैसा खतरनाक है यह

सतही ज़िन्दगी का सतही स्तर

बाहरी चीख-चिल्लाहट 

सुनाई नहीं देता है आत्मा का स्वर

ऐसे में असहज है कितना

द्वंद्व-स्थिति में संकल्प-शक्ति से

किसी भी…

Continue

Added by vijay nikore on October 25, 2019 at 1:22pm — 4 Comments

स्वप्न-सृष्टि

 स्वप्न-सृष्टि

 

बुझते  दिन  का  सहारा  बनी 

गहन  गंभीर  अभागी  शाम

मन  में  अब  अपने  ही  पुराने  घाव  की

मौन  वेदना  की  गुथियाँ  समेटती

बूँद-बूँद  गलती

पहले  स्वयं  सरकती-सी  रात  की ओर

अंधेरा  होते  ही  फिर  घसीट लेती  है  रात

बेरहमी  से अपनी काली कोठरी  में …

Continue

Added by vijay nikore on October 15, 2019 at 4:30am — 2 Comments

ज़िन्दगी का वह हिस्सा

अनपेक्षित तज्रिबों को  लीलती हुई

मन में सहसा उठते घिरते

उलझी रस्सी-से खयालों को ठेलती

गलियाँ पार करती  चली आती थी तुम

तब साथ तुम्हारा था

साहस हमारा

तुम्हारी मनोहर महक

थी दमकती हवाओं का उत्साह

और तुम्हारे चेहरे की चमक 

थी हमारी शाम की अजब रोशनी

और मैं ...

तुम्हारी बातें सुनते नहीं थकता था

हँसी के पट्टे पर कूदते-खेलते

बीच हमारे कोई सरहदें

सीमाएँ न थीं

समय के पल्लू में…

Continue

Added by vijay nikore on October 14, 2019 at 9:23am — 8 Comments

गहन अँधेरे में

रात-अँधेरे सारी रात

टटोलते कोई एक शब्द

स्वयं में स्माविष्ट कर ले 

जो तुम्हारे आने का उल्लास

चले जाने का विषाद

कभी बूँद-बूँद में लुप्त होती

खिलखिलाती रंग-बिरंगी हँसी

और प्यारी हिचकियाँ तुम्हारी

आँसू ढुलकाती, मेरी ओर ताकती

दीप-माला-सी तुम्हारी आँखें

कि मोहनिद्रा में जैसे

मेरे ओठों पर तुम

अपने शब्दों को खोज रही हो

यह प्रासंगकि नहीं है क्या

कि मैं रात-अँधेरे सारी रात

टटोल रहा…

Continue

Added by vijay nikore on October 1, 2019 at 3:30pm — 8 Comments

आत्मा की आहट

कितने "अपने"

पहचाने थे यही रास्ते

पेड़ों की छाँह ओढ़े

कुहनी टेक

सरक जाते थे कितने

अच्छे-बुरे तजुर्बे

अचानक

चौंक जाती थी शाम

"मुझको घर जाना है"

तुम्हारे अरुणिम ललाट पर

अकस्मात चिंता की छायाएँ

और फिर ...

और फिर देख 

मेरी आँखों में अपनी आँखों की चमक

तुम्हारा ही मन नहीं करता था 

हाथ छोड़ चले जाने को

कि मानो जाते-जाते रुक जाती थी शाम

एक "और" आज के प्रेम-पत्र…

Continue

Added by vijay nikore on September 30, 2019 at 10:22pm — 6 Comments

अन्तस्तल

भीतर तुम्हारे

है एक बहुत बड़ा कमरा

मानो वहीं है संसार तुम्हारा

वेदना, अतृप्ति, विरह और विषमता

काले-काले मेघ और दुखद ठहराव

इन सब से भरा यह कमरा बुलाता है तुमको

जानती हूँ यह भी कि इस कमरे से तुम्हारा

रहा है बहुत पुराना गहरा गोपनीय रिश्ता  

इस आभासी दुनिया के मिथ्यात्व से दूर होने को

तुम कभी भी किसी भी पल धीरे हलके-हलके

अपराध-भाव-ग्रस्त मानों फांसी के फंदे पर झूलते

बिना कुछ बोले उस कमरे में जब भी…

Continue

Added by vijay nikore on September 16, 2019 at 9:39am — 6 Comments

निस्सम्बन्ध

पूर्तिहीन संवाद

आकुलित असंवेदित भाव

अपाहिज हुई वह जो होती थी

स्नेह की अपेक्षित शाम

गई कहाँ वह ममतामयी प्रतीक्षातुर बाहें

दिशायों से आती तुम्हारे आने की आहट

ऊब गई है, उकता गई है कब से

नपुंसक दुखजनित अजनबी हुई आस्था

महिमामयी स्मृतियों के आस-पास

मटमैली रौशनी सुनसान गहरी उदास

फिर क्यूँ जोड़ती हैं हमें देहहीन परछाइयाँ                   

आसाधारण अपूर्ण प्रवाही दिशाहीन हवा-सी

कसकती…

Continue

Added by vijay nikore on September 8, 2019 at 3:58pm — 2 Comments

संबंध-सूत्र

अजीब अवस्था है

कोई खुरदरी विवशता है

और है अद्भुत  चित्ताकर्षण ....

पलकों के आसपास 

गहन दूरता का आवरण

कि  जैसे  हो  फैल  रहा

मूर्छा का मौन वातावरण

अपरिचित भीड़ में खो गईं 

कितनी  परिचित  संज्ञाएँ

सरोवर-सदृश  संवेदनाएँ

फिर  भी  न  जाने  कैसे

दरिद्र हुई धड़कन में भी आदतन

कोई वादा निभाने के बहाने ही शायद

डरी  हुई  बाहें  फैलाए

व्याकुलतर  गति  से  छू  लेती  हैं

आज भी…

Continue

Added by vijay nikore on September 3, 2019 at 7:27am — 4 Comments

संबंधों का जाल

अचानक अजीब मनोदशा

अँधेरी हो रही हैं धुँधली आँखें

कुछ नहीं जानता मैं अब भँवर में

कुछ भी नहीं पहचानता हूँ अंत में

यह निसत्बध्ता, यह काया

एकाकार हो रहे हैं  क्या ?

 

साथ बंधी आ रही हैं  कभी  की

रात देर तक करी हमारी बातें

समुद्र की लहर-सी छलकती

अमृत के झरनों-सी हम दोनों की हँसी

आँखों में  ठहरे कभी के अनुच्चरित प्रश्न

पल में तुम्हारा परिचित चिंता में डूब जाना

उफ़्फ़.. इतने वर्षों के बाद भी वही है…

Continue

Added by vijay nikore on August 8, 2019 at 6:14pm — 8 Comments

अनसुने अनकहे के बीच

कहे-अनसुने-से रहे कुछ जज़्बात

उसपर अनकहे एहसासों का भार

अजीब-सी बेचैन बेकाबू धड़कन का

तकलीफ़-भरा भयानक शोर ...

पन्नों पर उतर तो आते हैं यह

पर भरमाया घबराया मन

इनकार भरा

भार कोई हल्का नहीं होता

पगलाई अन्दरूनी हवाएँ

खयालों-सी वेगवान

झकझोरती आसमानी तूफ़ान बनी

लफ़्ज़ों से लफ़्ज़ टकराते

सूखे पेड़ों-से छूटे पत्तों की तरह

आढ़ी-टेढ़ी लकीरों को बेतहाशा समेटते

लुढ़क जाती है स्याही

रात अँधेरी…

Continue

Added by vijay nikore on August 5, 2019 at 7:52am — 6 Comments

उलझा-सा सवाल

जाड़े की सुबह का ठिठुरता कोहरा

या हो ग्रीश्म की तपती धूप की तड़पन

अलसाए खड़े पेड़ की परछाईं ले अंगड़ाई

या आए पुरवाई हवा लिए वसन्ती बयार

उमड़-उमड़ आता है नभ में नम घटा-सा

तुम्झारी झरती आँखों में मेरे प्रति प्रतिपल

धड़कन में बसा लहराता वह पागल प्यार

इस पर भी, प्रिय, आता है खयाल

फूल कितने ही विकसित हों आँगन में

पर हो आँगन अगर बित्ता-भर उदास

छू ले सदूर शहनाई की वेदना का विस्तार

तो…

Continue

Added by vijay nikore on July 29, 2019 at 2:49am — 4 Comments

प्रश्न-गुंथन

उर-विदारक उलझन

बर्फ़ीला एहसास

गूँजता-काँपता

एक सवाल

तुम्हा्रा स्नेह भरा संवेदित हृदय 

सुनता तो हूँ उसमें नित्य  नि:सन्देह

संगीत-सी तरंगित अपनी-सी धड़कन

फिर क्यूँ  तुम्हारे आने के बाद

मन के तंग घेरों में लगातार

सिर उठाए ठहरा रहता है हवा में

आदतन एक ख़याल 

एक अंगारी सवाल --

शीशे के गिलास का

हाथ से छूट जाना

तुम्हारे लिए

सामान्य तो नहीं है न ?

       …

Continue

Added by vijay nikore on July 22, 2019 at 7:08am — 4 Comments

एक और खंडहर

स्मृतियाँ आजकल

आए-गए अचानक

कांच के टुकड़ों-सी

बिखरी

चुभती

छोटी-से-छोटी घटना भी

हिलोर देती है हृदय-तल को

हँसी डूब जाती है

नई सृष्टि ...

नए संबंध आते हैं

पर अब दिन का प्रकाश

सहा नहीं जाता

सूर्योदय से पहले ही जैसे

हम बुला लेते हैं शाम

मंडराते रह जाते हैं पतंगों की तरह

प्यार के कुछ शब्द

धुंधले वातावरण में भीतर

नए प्यार के आकार की रेखाएँ

स्पष्ट नहीं…

Continue

Added by vijay nikore on July 21, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
yesterday
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service