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Tasdiq Ahmed Khan's Blog (117)

ग़ज़ल (जो अज़मे तर्के उल्फ़त कर रहा है )

(मफाईलुन-मफाईलुन-फऊलन )

जो अज़मे तर्के उल्फ़त कर रहा है|

ये दिल फिर उसकी हसरत कर रहा है |

लगाए ज़ख़्म देने वाला मरहम

ये दिल यूँ ही न हैरत कर रहा है |

वफ़ा मिलती कहाँ है हुस्न में वो

जिसे पाने की जुरअत कर रहा है |

दिले नादां दगा जिसकी है फ़ितरत

उसी से तू महब्बत कर रहा है |

मरीज़े इश्क़ की लौटी हैं साँसें

कोई शायद अयादत कर रहा है |

मिलेंगे हश्र में यह बोल कर वो

मुझे कूचे…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 21, 2018 at 8:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल ( दूर माशूक़ से आशिक़ कहाँ जाना चाहे )

(फाइलातुन -फइलातुन- फइलातुन-फेलुन )

दूर माशूक़ से आशिक़ कहाँ जाना चाहे |

कूचये यार में वो अपना ठिकाना चाहे |

मैं ही आया हूँ नहीं सिर्फ़ परखने क़िस्मत

उन को तो अपना हर इक शख्स बनाना चाहे |

थाम के हाथ जो देता हो हमेशा धोका

कौन उस शख्स से फिर हाथ मिलाना चाहे |

फितरते शमअ जलाना है तअज्जुब है मगर

जान परवाना वहाँ फिर भी लुटाना चाहे |

मुफ़लिसी के हैं यह मारे हुए ज़ालिम वरना

तेरी दहलीज़ पे सर कौन…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 12, 2018 at 12:30pm — 23 Comments

ग़ज़ल (मुझको अपना बना कर दगा दे गया )

ग़ज़ल (मुझको अपना बना कर दगा दे गया )

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(फाइलुन-- फाइलुन--फाइलुन--फाइलुन)

 

कोई उल्फ़त का बहतर सिला दे गया |

मुझको अपना बनाकर दगा दे गया |

 

जो खता मैं ने की ही नहीं प्यार में

उफ़ मुझे वो उसी की सज़ा दे गया |

 

दास्ताँ मैं तबाही की कैसे कहूँ

वो मुझे प्यार का वास्ता दे गया |

 

दूर यूँ मौत से कब हुई ज़िंदगी

कोई जीने की मुझको दुआ दे गया…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 2, 2018 at 10:43pm — 10 Comments

ग़ज़ल (मैं क़िस्मत आज़माई कर रहा हूँ )

(मफ़ाईलुन -मफ़ाईलुन- फ़ऊलन)



मैं क़िस्मत आज़माई कर रहा हूँ |

शुरूए आशनाई कर रहा हूँ |

चुरा कर वो नज़र कहते यही हैं

मैं उनसे बेवफ़ाई कर रहा हूँ |

दिया है सिर्फ़ शीशा एब जू को

मैं कब उसकी बुराई कर रहा हूँ |

जमी जो धूल दिल के आइने पर

उसी की मैं सफ़ाई कर रहा हूँ |

सितमगर सिर्फ़ हक़ माँगा है अपना

मैं कब बेजा लड़ाई कर रहा हूँ |

परख लेना कभी भी वक़्ते मुश्किल

नहीं मैं ख़ुद नुमाई…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 31, 2018 at 12:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल ( निकल कर तो आओ कभी रोशनी में )

ग़ज़ल ( निकल कर तो आओ कभी रोशनी में )

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(फऊलन-फऊलन-फऊलन-फऊलन)

चलाओ न तीरे नज़र तीरगी में |

निकल कर तो आओ कभी रोशनी में |

कमी दर्दे दिल में तो अब भी नहीं है

मज़ा आ रहा है तुम्हें दिल लगी में |

मेरी ही नहीं है यह सबकी ज़ुबा पर

लुटे क़ाफ़िले सब तेरी रहबरी में |

करूँ फ़ख़्र मैं क्यूँ न क़िस्मत पे अपनी

दिवाना हुआ हूँ तुम्हारी गली में |

यूँ…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 18, 2018 at 9:59pm — 10 Comments

ग़ज़ल (शिकायत भला हम करें क्या किसी से )

ग़ज़ल (शिकायत भला हम करें क्या किसी से )

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(फऊलन- फऊलन-फऊलन-फऊलन)

चुने हैं ग़मे यार अपनी ख़ुशी से |

शिकायत भला हम करें क्या किसी से |

मिले सिर्फ़ धोके ही अपनों से हम को

वफ़ा अब करेंगे किसी अजनबी से |

खिज़ाओं ख़बरदार उनकी है आमद

सदा फूल खिलते हैं जिनकी हँसी से |

मिला कर नज़र से नज़र यह बताएँ

हुआ दिल ये बर्बाद किस की कमी से |

कभी दोस्तों…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on January 18, 2018 at 9:33pm — 10 Comments

ग़ज़ल( उठ न जाए क़ियामत नये साल में )

ग़ज़ल( उठ न जाए क़ियामत नये साल में )

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( फाइलुन--फाइलुन--फाइलुन--फाइलुन)

उन पे आई बुलूगत नये साल में |

उठ न जाए क़ियामत नये साल में |

भूल बैठे पुरानी अदावत को वो

देख कर मेरी मिन्नत नये साल में |

बाग़बाने चमन ज़ुल्म से बाज़ आ

वरना होगी बग़ावत नये साल में |

दिल में घर कर नहीं पाएँ शिकवे कभी

डालिए एसी आदत नये साल में |

राह तकता हूँ मुद्दत से…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 31, 2017 at 10:10pm — 22 Comments

ग़ज़ल (यूँ नहीं मैं ने ज़माने से बग़ावत की है )

(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फेलुन)

यूँ नहीं मैं ने ज़माने से बग़ावत की है |

मुझ से उस शोख़ ने बे लौस मुहब्बत की है |

दिल ने मजबूर बहुत कर दिया मुझको वर्ना

मैं ने कब मर्ज़ी से उस शोख़ की हसरत की है |

मुझ से उम्मीद वफ़ा की है उसी को यारो

उम्र भर जिसने मेरे साथ अदावत की है |

रहनुमाई के लिए मैं ने चुना था जिसको

हाए उसने भी मेरे साथ सियासत की है |

सोच लेना वो कोई ग़ैर नहीं अपने हैं

तुमने…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 27, 2017 at 2:00pm — 24 Comments

ग़ज़ल (मिलाओ किसी से नज़र धीरे धीरे )

ग़ज़ल (मिलाओ किसी से नज़र धीरे धीरे )

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(फऊलन -फऊलन -फऊलन -फऊलन )

मिलाओ किसी से नज़र धीरे धीरे |

निकल जाएगा दिल से डर धीरे धीरे |

मुहब्बत में अंजाम की फ़िक्र मत कर

करे है यह दिल पे असर धीरे धीरे |

अभी तुझको जी भर के देखा कहाँ है

निगाहों में आ के ठहर धीरे धीरे |

मिलेगा वफ़ा का सिला सब्र तो कर

वो लेते हैं दिल की ख़बर धीरे धीरे |

यही इंतहा है…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 16, 2017 at 8:28pm — 24 Comments

ग़ज़ल (किसी खंजर का मत अहसान लीजिए )

(मफाईलुन-मफाईलुन -फऊलन )

किसी खंजर का मत अहसान लीजिए |

हमारी मुस्करा कर जान लीजिए |

जिसे अपना बनाने जा रहे हैं

उसे अच्छी तरह पहचान लीजिए |

हमारा साथ दोगे ज़िंदगी भर

वफ़ा से पहले दिल में ठान लीजिए |

मुझे तो बाद में चुन लीजिएगा

जहाँ की खाक पहले छान लीजिए |

किसे है ख़ौफ़ दिलबर इम्तहाँ का

कमाँ हाथों में अपने तान लीजिए |

किसी का लीजिए अहसान लेकिन

न दौलत मंद का अहसान लीजिए…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on December 7, 2017 at 2:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल (नाज़ कब वो भी उठा पाते हैं दीवाने का )

(फाइलातुन -फ़इलातुन-फ़इलातुन-फेलुन )

जिन से आबाद हर इक गोशा है वीराने का |

नाज़ कब वो भी उठा पाते हैं दीवाने का |

इंतज़ारी में कटी उम्र नहीं इसका गम

रंज है आपका वादे से मुकर जाने का |

कमसे कम मेरे ख़यालों में ही आ जाया करो

वक़्त कब मिलता है तुम को मेरे घर आने का |

लाख तू मेरी वफ़ाओं को भुला दे दिल से

अज़्म मुहकम है मेरा प्यार तेरा पाने का |

कोई इक बूँद को तरसे कोई भर भर के पिए

खूब दस्तूर…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on November 17, 2017 at 11:00am — 24 Comments

ग़ज़ल (आने वाला कोई फिर दौरे परेशानी है )

(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फेलुन )

आने वाला कोई फिर दौरे परेशानी है |

यक बयक करने लगा कोई महरबानी है |

देखता है जो उन्हें कहता है वो सिर्फ़ यही

इस ज़माने में नहीं उनका कोई सानी है |

आएगा सामने उसका भी नतीजा जल्दी

वक़्त के हुक्मरा की तू ने जो मनमानी है |

ख़त्म हो जाएगी हर चीज़ ही क्या है दुनिया

सिर्फ़ उल्फ़त ही वो शै है जो नहीं फानी है |

आ गया जब से मुझे उनका तसव्वुर करना

हो गई तब से…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on November 8, 2017 at 10:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल (सबसे छोटा क़ाफ़िया और सबसे लंबी रदीफ़ )

(फेलुन -फइलुन -फेलुन -फेलुन -फेलुन -फइलुन -फेलुन -फेलुन )

लल का न करे कोई चर्चा वो याद मुझे आ जाएँगे |

छल का न करे कोई चर्चा वो याद मुझे आ जाएँगे |

ज़ालिमकेमुक़ाबिल लब यारों मैं खोलभीदूँगाअपने मगर

बल का न करे कोई चर्चा वो याद मुझे आ जाएँगे |

लम्हे जो गुज़ारे उल्फ़त में मुश्किल से मैं उनको भूला हूँ

पल का न करे कोई चर्चा वो याद मुझे आ जाएँगे |

तूफ़ां से बचा कर कश्ती को लाया तो हूँ साहिल पर लेकिन

जल का न करे कोई…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 20, 2017 at 6:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल -दीपावली (दिल में चरागे इश्क़ तो पहले जलाइए )

मफऊल -फ़ाइलात -मफाईल -फाइलुन 

 

दिल में चरागे इश्क़ तो पहले जलाइए |

नफ़रत मिटा के दीपावली फिर मनाइए |

 

तहवार भाई चारे का अहले वतन है यह

लग कर गले से रस्मे महब्बत निभाइए|

 

होने लगीं हवाएँ भी ज़हरीली दोस्तों

आतिश फशाँ पटाखे न घर में चलाइए |

 

करवा के बंद हर तरफ होता हुआ जुआ

रुसवाइयों से दीपावली को बचाइए  |

 

फरहत ही जिस ग़रीब की मंहगाई खा गई

कैसे मनाए दीपावली वो बताइए…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 20, 2017 at 9:00am — 6 Comments

ग़ज़ल (आ गये सिमट के)

फइलात -फ़ाइलातुन -फइलात -फ़ाइलातुन



सरे राह उसने देखा जो मुझे पलट पलट के |

उसी दिन से रह गया हूँ मैं मुआशरे से कटके |

अभी रूठ कर उठे थे कि कड़क के बर्क़ चमकी

मेरी बाहों में वो सहमे हुए आ गये सिमट के |

बड़ी रात जा चुकी है कोई ख़ाक आएगा अब

शबे ग़म मेरी इधर आ तुझे रो लूँ मैं लिपट के |

जो ग़रीब हौसला है उसे होगा कुछ न हासिल

वही जाम पा सकेगा जो उठा ले ख़ुद झपट के |

जिन्हें गुमरही का डर था वही पा गये हैं…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 17, 2017 at 6:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल (ख़ौफे ख़ुदा नहीं है )

मफऊल -फाइलातुन -मफऊल -फाइलातुन



मेरे हबीब इस में तेरी खता नहीं है |

इल्ज़ामे बे वफ़ाई किस पर लगा नहीं है |

ओ प्यार के मुसाफिर इस पर भी ग़ौर कर ले

यह राहे ग़म है इस में कोई मज़ा नहीं है |

माली तेरी कमी से गुलशन में है तबाही

तू अब भी कह रहा है तुझको पता नहीं है |

दीदार मैं अभी तक चहरे का कर रहा हूँ

ठहरो अभी न जाओ यह दिल भरा नहीं है |

ग़मदीदा दिलसे उल्फ़त तुझसे न निभ सकेगी

कर तर्के इश्क़ कुछ भी…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 17, 2017 at 4:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल ( कोई देखे हमें महब्बत से )

फाइलातुन -मफ़ाइलुन -फेलुन 



दिल की हसरत यही है मुद्दत से |

कोई देखे हमें महब्बत से |

नामे उल्फ़त से जो नहीं वाक़िफ़

देखता हूँ मैं उसको हसरत से |

सब्र का फल तो खा के देख ज़रा

क्यूँ है मायूस उसकी रहमत से |

जिस ने देखा उन्हें यही बोला

उनको रब ने बनाया फ़ुर्सत से |

उसके हाथों में आइना दे दो

बाज़ आए नहीं जो गीबत से |

देखिए तो करम अज़ीज़ों का

वो हैं बे ज़ार मेरी सूरत से…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 6, 2017 at 12:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल -तरही -2(उनके सोए हुए जज़्बात जगा भी न सकूँ )

(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फइलुन /फेलुन)

आ गया हूँ वहाँ जिस जा से मैं जा भी न सकूँ |

मा सिवा उनके कहीं दिल को लगा भी न सकूँ |

इस तरह बैठे हैं वो फेर के आँखें मुझ से

उनके सोए हुए जज़्बात जगा भी न सकूँ |

मेरी महफ़िल में किसी ग़ैर को लाने वाले

दिल से मजबूर हूँ मैं तुझको जला भी न सकूँ |

फितरते तर्के महब्बत है तेरी यार मगर 

तेरी इस राय को मैं अपना बना भी न सकूँ |

इतना मजबूर भी मुझको न खुदा कर देना…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 24, 2017 at 9:00am — 16 Comments

ग़ज़ल (अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम )

ग़ज़ल (अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम )

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(फ़ाइलुन -फ़ाइलुन -फ़ाइलुन -फ़ाइलुन)

 

अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम |

उनके कुचे से वापस न जाएँगे हम |

 

ज़ुल्म कितने भी ढा ले सितमगार तू

ग़म के हर दौर में मुस्कराएँगे हम |

 

आपको तो अज़ीज़ों से फ़ुर्सत नहीं

किस तरह हाल दिल का सुनाएँगे हम |

 

जब भी मिलता है देता है वो ज़ख़्मे नौ

दस्त उलफत का कब तक मिलाएँगे…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 14, 2017 at 10:23pm — 14 Comments

ग़ज़ल ( हाए वो शख़्स निकलता है सितमगर यारो )

ग़ज़ल ( हाए वो शख़्स निकलता है सितमगर यारो )

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(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फेलुन )



मुन्तखिब करता है दिल जिसको भी दिलबर यारो |

हाए वो शख़्स निकलता है सितम गर यारो |

उनके चहरे से नज़र हटती नहीं है मेरी

किस तरह देखूं ज़माने के मैं मंज़र यारो |

कूचए यार से जाएँ तो भला जाएँ कहाँ

राहे उलफत में लुटा बैठे हैं हम घर यारो |

आस्तीनों में जो रखते हैं…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 5, 2017 at 6:14pm — 17 Comments

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