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आशीष यादव's Blog (67)

पानी गिर रहा है

2122 2122 2122 2122

इश्क बनता जा रहा व्यापार पानी गिर रहा है 

हुस्न रस्ते में खड़ा लाचार पानी गिर रहा है

चंद जुगनू पूँछ पर बत्ती लगाकर सूर्य को ही

बेहयाई से रहे ललकार पानी गिर रहा है 

टाँगकर झोला फ़कीरी का लबादा ओढ़कर अब

हो रहा खैरात का व्यापार पानी गिर रहा है 

बाप दादों की कमाई को सरे नीलाम कर वह

खुद को साबित कर रहा हुँशियार पानी गिर रहा है 

झूठ के लश्कर बुलंदी की तरफ बढ़ने लगे हैं

साँच की होने लगी…

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Added by आशीष यादव on July 30, 2020 at 5:21am — 8 Comments

यह प्रणय निवेदित है तुमको

हे रूपसखी हे प्रियंवदे

हे हर्ष-प्रदा हे मनोरमे

तुम रच-बस कर अंतर्मन में

अंतर्तम को उजियार करो

यह प्रणय निवेदित है तुमको

स्वीकार करो, साकार करो

अभिलाषी मन अभिलाषा तुम

अभिलाषा की परिभाषा तुम

नयनानंदित - नयनाभिराम

हो नेह-नयन की भाषा तुम

हे चंद्र-प्रभा हे कमल-मुखे

हे नित-नवीन हे सदा-सुखे

उद्गारित होते मनोभाव

इनको ढालो, आकार करो

यह प्रणय निवेदित है तुमको

स्वीकार करो साकार करो

मैं तपता…

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Added by आशीष यादव on June 15, 2020 at 4:30am — 10 Comments

हाँ बहुत कुछ याद है

अकेले तुम नहीं यारा

तुम्हारे साथ और भी बात

मुझे हैं याद



कि जैसे फूल खिला हो

तुम हसीं, बिलकुल महकती सी

चहकती सी

 मृदुल किरणों में धुलकर आ गई

और छा गई

जैसे कि बदली जून की

तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती

ठाँव देती हो मुसाफिर को



कि जैसे झील हो गहरी

कि ये भहरी…

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Added by आशीष यादव on April 17, 2020 at 7:09am — 2 Comments

कोरोना

नहीं हमारी नहीं तुम्हारी

अखिल विश्व में महा-बिमारी

आई पैर पसार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

निकल चीन से पूर्ण जगत में डाल दिया है डेरा

यह विषाणु से जनित बिमारी, खतरनाक है घेरा

रहो घरों में रहो अकेले

नहीं लगाओ जमघट मेले

कहती है सरकार

भैया मत छोड़ो घर-द्वार 

नहीं आम यह सर्दी-खाँसी इसका नाम कोरोना

नहीं दवाई इसकी, होने पर केवल है रोना

इसीलिए मत घर से निकलो

धीर धरो पतझड़ से निकलो

मानो…

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Added by आशीष यादव on April 4, 2020 at 11:33am — 2 Comments

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो 

घर आँगन में उजियारा हो

दुःखों का दूर अँधियारा हो

हो नई चेतना नवल स्फूर्ति

नित नव प्रभात आभामय हो

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो 

नित नई नई ऊँचाई हो

हृद प्राशान्तिक गहराई हो

नित नव आयामों को चूमो

चहुँओर तुम्हारी जय जय हो

नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो 

जो खुशियाँ अब तक नहीं मिलीं

जो कलियाँ अब तक नहीं खिलीं

जीवन के नूतन अवसर पर

उनका मिलना-खिलना तय हो

नव वर्ष तुम्हे मंगलमय…

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Added by आशीष यादव on January 1, 2020 at 12:31am — 13 Comments

सच सच बोलो आओगी ना

सच सच बोलो आओगी ना

जब सूरज पूरब से पश्चिम

तक चल चल कर थक जाएगा

और जहाँ धरती अम्बर से

मिलती है उस तक जाएगा

चारो ओर सुनहला मौसम

और सुनहली लाली होगी

और लौटते पंछी होंगें

खेत-खेत हरियाली होगी 

 

दिन भर के सब थके थके से

अपने घर को जाते होंगे

कभी झूम कर कभी मन्द से

पवन बाग लहराते होंगे 

 

तुम भी उसी बाग के पीछे

आकर उसी आम के नीचे

झूम-झूम कर मेरे ऊपर

तुम खुद को लहराओगी ना

सच सच बोलो…

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Added by आशीष यादव on December 22, 2019 at 10:30pm — 4 Comments

फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है


फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है।
तेरी यादों में गोते खा रहा हूँ
हवा हौले से छूकर जा रही है।
तेरी खुशबू में भीगा जा रहा हूँ।


लिपट कर चाँदनी मुझसे तुम्हारे
बदन का खुशनुमा एह्सास देती
कभी तन्हा अगर महसूस होता
ढलक कर गोद में एक आस देती


नहीं हो तुम मगर ये सब तुम्हारे
यहाँ होने का एक जरिया बने हैं
समा पाऊँ तेरी गहराइयों में
हवा खुशबू फ़लक दरिया बने हैं। 

 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:13am — 2 Comments

तुमने उसकी याद दिला दी

जाने अनजाने में कितनी

जिसे सोचते रातें काटीं

लम्हों-लम्हों में किश्तों में

जिनको अपनी साँसें बाटीं

कभी अचानक कभी चाहकर

जिसे ख़यालों में लाता था

और महकती मुस्कानों पर

सौ-सौ बार लुटा जाता था 

उसकी बोली बोल हृदय में

तुमने जैसे आग लगा दी

तुमने उसकी याद दिला दी



अँधियारी रजनी में खिलकर

चम-चम करने लगते तारे

इक चंदा के आ जाने से

फ़ीके पड़ने लगते सारे

शीतल शांत सजीवन नभ में

रजत चाँदनी फैलाता था

तम-गम में भी…

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Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:00am — 4 Comments

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम सुगंध खिलते गुलाब सी

सुन्दर कोमल मधुर ख्वाब सी

मैं मरुथल का प्यासा हरिना

ललचाती मुझको सराब* सी

तुमको पाने की चाहत में

अब तक मचल रही हैं साँसें

तुम ही कह दो तुमको अपने

प्राणों का मनमीत लिखूँ क्या

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम शीतल हो चंदन वन सी

तुम निर्मल-जल, तुम उपवन सी

तुम चंदा सी और चाँदनी-

सी तुम हो, तुम मलय-पवन सी

नयन मूँद कर तुमको देखूँ…

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Added by आशीष यादव on December 15, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

दर्द

ये रातें जल रही हैं,

वो बातें खल रही हैं

लगा दी ठेस तुमने दिल के अंदर

नसें अंगार बनकर जल रही हैं

मौसम सर्द है,

जीवन में लेकिन

लगी है आग,

तन मन जल रहा है।

जिसे उम्मीद से बढ़कर था माना

वही घाती बना है छल रहा है।

तुम्हारी ठोकरों के बीच आकर

बहुत टूटा हुआ हूँ, लुट गया हूँ

तेरा सम्मान खोकर, स्नेह खोकर

स्वयं ही बुझ चुका हूँ, घुट गया हूँ।

यहाँ हालात क्या से क्या हुआ है

नहीं कुछ सूझता…

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Added by आशीष यादव on June 1, 2019 at 5:02pm — No Comments

हम तुम, दो तट नदी के

हम तुम

दो तट नदी के

उद्गम से ही साथ रहें हैं

जलधारा के साथ बहे हैं

किन्तु हमारे किस्से कैसे, हिस्से कैसे

सबने देखा, सबने जाना,

रीति-कुरीति, रस्म-रिवाज, अपने-पराये

सब हमारे बीच आये

एक छोर तुम एक छोर मैं

इनकी बस हम दो ही सीमाएं

जब इनमे अलगाव हुआ दुराव हुआ

धर्म-जाति का भेदभाव हुआ

क्षेत्रवाद और ऊँच-नीच का पतितं आविर्भाव हुआ

तब हम तुम

इस जघन्य विस्तार से और दूर हुए

तब भी इन्हें हमने ही हदों…

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Added by आशीष यादव on April 1, 2017 at 1:30pm — 6 Comments

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है

2122 2122 2122 212



पग सियासी आँच पर मधु भी जहर होने को है।

बच गया ईमान जो कुछ दर-ब-दर होने को है।।



मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।



उड़ रहा है जो हकीकत की धरा को छोड़ कर।

बेखबर वो जल्द ही अब बाखबर होने को है।।



वो जो बल खा के चलें इतरा के घूमें कू-ब-कू।

खत्म उनके हुस्न की भी दोपहर होने को है।।



जुल्म से घबरा के थक के हार के बैठो न तुम।

"हो भयावह रात कितनी भी सहर होने…

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Added by आशीष यादव on March 3, 2017 at 12:00pm — 18 Comments

वीर अब्दुल हमीद

हम मजा लूटते कितने सुख चैन से

कुछ तो सोचो, मजा पे क्या अधिकार है ?

जो शहादत दिए हैं हमारे लिए

याद उनको करो, ना तो धिक्कार है



अपना कर्तव्य क्या है धरा के लिए

फ़र्ज़ कितना चुकाया है हमने यहाँ

मैं कहानी सुनाता हूँ उस वीर की

खो गया आज है जो न जाने कहाँ



वीरता हरदम ही दुनिया में पूजी जाती है

बन के ज्वाला दुष्टों के हौसले जलाती है

ऐसे ही वीरता की गाथा आज गाता हूँ

वीर अब्दुल हमीद की कथा…

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Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 2:30pm — 4 Comments

हाँ तुम सपने में आई थी

हाँ तुम सपने में आई थी



होठों पर मुस्कान सजाये

बालों में बादल लहराए

गालों पर थी सुबह लालिमा

माथे पर बिंदिया चमकाए

जब तुमको मैंने देखा था

पास खड़ी तुम मुस्काई थी

हाँ तुम सपने में आई थी…

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Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 1:45pm — 10 Comments

तुम मुझको कितना भाती हो

कैसे मै बतलाऊँ तुमको,

तुम मुझको कितना भाती हो|



जैसे ये मनमोहक सावन,

जैसे पवन बसन्ती पावन,

जैसे उर मे बस जाती है

हरी-भरी यह धरा लुभावन,



तुम इस भाँति लुभा जाती हो,



कैसे मै बतलाऊँ तुमको

तुम मुझको कितना भाती हो|



जैसे वात मलयजी डोले,

जैसे पेंग भरे हिंडोले,.

जैसे ताँक-झाँक करने को ,.

चंदा घन-वातायन खोले..



मेरे हृदय समा जाती हो ,



कैसे मै बतलाऊँ तुमको

तुम मुझको कितना भाती हो|



ज्यों… Continue

Added by आशीष यादव on December 17, 2016 at 6:56am — 6 Comments

चिर-दिनों तक तुम हो मेरी

चिर-दिनों तक तुम हो मेरी,

युगों युगों तक रहूँ तुम्हारा|

इक दूजे से अलग नही हम,

जनम-जनम तक साथ हमारा|



जितनी मर्जी उतना रुठो,

जितना मन हो रहो बेखबर,

तुम्हे मनाऊँ चिर-जीवन तक,

बिछड़न तुमसे नही गँवारा|



आस मेरी तुम साँस मेरी तुम,

तुम ही मेरे दिल की धड़कन,

अब तो सबकुछ तुम ही मेरी,

नजरों को बस तुम्ही नजारा|



तुमको चाहूँ तुम्हे सराहूँ,

तेरे ही बारे मे सोचूँ,

उस जीवन को भूल गया हूँ,

जो कुछ तेरे बिना… Continue

Added by आशीष यादव on June 2, 2016 at 11:21am — 6 Comments

दोहे

पिय बिन चित चंचल रहे, सावन जारे देह।
बूँद बढ़ाये अगन को, विरहिणि बिछुड़ा नेह।।

बिरहा ढोला लोरिकी, चैती को नही मान।
नंगी धुन पर नाचता, पूरा हिन्दुस्तान ।।

माता जी मम्मी भईं, हुए पिता जी डैड।
यह संस्कृति नंगी हुई, हिन्दुस्तानी मैड।।

क्या था अभिनय भूलकर, आज दिखाते जिस्म।
मजबूती से फाँसता, अश्लीलता तिलिस्म।।

(मौलिक व अप्रकाशित

Added by आशीष यादव on November 20, 2015 at 7:30am — 8 Comments

सरिता

हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

 

तुम कलकल कलरव की हो गान

हो लिपटे बेलों की वितान

तुम वसुन्धरा की शोभा हो

हे आन मान सरिता महान

तुझमे दिखता जीवन सारा

हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

 

तुझमे निज-छवि लखते उडगन

यह विम्ब देख हर्षाता मन

सुषमा ऐसी नयनों मे बसा

रहता बस मे किसका तन मन

दिखता तुझमे चन्दा प्यारा

हे शान्त स्निग्ध जल की धारा

 

हे मिट्टी की सोंधी सुगन्ध

बाँधे सबको जो पाश…

Continue

Added by आशीष यादव on August 5, 2013 at 11:30pm — 15 Comments

मजबूरी क्यों खून के आंसू पीने की

जिनके लिये हिन्द प्राण से प्यारा था।

सत्य अहिंसा ही बस जिनका नारा था।

तैंतीस कोटि जनो का जो विश्वास था।

जिसमे होता देवों का आभाष था।

जिसने देखे स्वप्न राम के राज की।

उसी हिन्द की दशा हुई क्या आज की।

सत्य बैठ कोने मे सिसकी लेता है।…

Continue

Added by आशीष यादव on March 10, 2013 at 10:30am — 7 Comments

कुछ कही कुछ अनकही (निजी डायरी के कुछ पन्ने)

मानव की प्रवृत्तियाँ क्या हैं? वह क्या चाहता है? क्या पसन्द है उसे? क्या नही पसन्द करता वो? ये सभी बातें उसी पर निर्भर हैं। किन्तु ये नही कहने वाला हूँ मै। कुछ और ही कहना चाहता हूँ।

कुछ लोगों को अच्छे लोग नही भाते बल्कि बुरे लोगो में दिलचस्पी हो जाती है। पता नही कैसा ये मन का रिश्ता है। क्या पता कब, कैसे, किससे जुड़ जाये। इसकी खबर भी नही लगती।

बात ये भी नही कहना चाहता मै लेकिन ये सभी घटनायें कभी न कभी अवश्य ही घटती हैं जीवन मे। इनके पीछे क्या होता है उस समय कोई नही जान सकता।…

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Added by आशीष यादव on August 20, 2012 at 10:00am — No Comments

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