2122 2122 2122 2122
इश्क बनता जा रहा व्यापार पानी गिर रहा है
हुस्न रस्ते में खड़ा लाचार पानी गिर रहा है
चंद जुगनू पूँछ पर बत्ती लगाकर सूर्य को ही
बेहयाई से रहे ललकार पानी गिर रहा है
टाँगकर झोला फ़कीरी का लबादा ओढ़कर अब
हो रहा खैरात का व्यापार पानी गिर रहा है
बाप दादों की कमाई को सरे नीलाम कर वह
खुद को साबित कर रहा हुँशियार पानी गिर रहा है
झूठ के लश्कर बुलंदी की तरफ बढ़ने लगे हैं
साँच की होने लगी…
Added by आशीष यादव on July 30, 2020 at 5:21am — 8 Comments
हे रूपसखी हे प्रियंवदे
हे हर्ष-प्रदा हे मनोरमे
तुम रच-बस कर अंतर्मन में
अंतर्तम को उजियार करो
यह प्रणय निवेदित है तुमको
स्वीकार करो, साकार करो
अभिलाषी मन अभिलाषा तुम
अभिलाषा की परिभाषा तुम
नयनानंदित - नयनाभिराम
हो नेह-नयन की भाषा तुम
हे चंद्र-प्रभा हे कमल-मुखे
हे नित-नवीन हे सदा-सुखे
उद्गारित होते मनोभाव
इनको ढालो, आकार करो
यह प्रणय निवेदित है तुमको
स्वीकार करो साकार करो
मैं तपता…
ContinueAdded by आशीष यादव on June 15, 2020 at 4:30am — 10 Comments
अकेले तुम नहीं यारा
तुम्हारे साथ और भी बात
मुझे हैं याद
कि जैसे फूल खिला हो
तुम हसीं, बिलकुल महकती सी
चहकती सी
मृदुल किरणों में धुलकर आ गई
और छा गई
जैसे कि बदली जून की
तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती
ठाँव देती हो मुसाफिर को
कि जैसे झील हो गहरी
कि ये भहरी…
Added by आशीष यादव on April 17, 2020 at 7:09am — 2 Comments
नहीं हमारी नहीं तुम्हारी
अखिल विश्व में महा-बिमारी
आई पैर पसार
भैया मत छोड़ो घर-द्वार
भैया मत छोड़ो घर-द्वार
निकल चीन से पूर्ण जगत में डाल दिया है डेरा
यह विषाणु से जनित बिमारी, खतरनाक है घेरा
रहो घरों में रहो अकेले
नहीं लगाओ जमघट मेले
कहती है सरकार
भैया मत छोड़ो घर-द्वार
नहीं आम यह सर्दी-खाँसी इसका नाम कोरोना
नहीं दवाई इसकी, होने पर केवल है रोना
इसीलिए मत घर से निकलो
धीर धरो पतझड़ से निकलो
मानो…
Added by आशीष यादव on April 4, 2020 at 11:33am — 2 Comments
नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो
घर आँगन में उजियारा हो
दुःखों का दूर अँधियारा हो
हो नई चेतना नवल स्फूर्ति
नित नव प्रभात आभामय हो
नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो
नित नई नई ऊँचाई हो
हृद प्राशान्तिक गहराई हो
नित नव आयामों को चूमो
चहुँओर तुम्हारी जय जय हो
नव वर्ष तुम्हें मंगलमय हो
जो खुशियाँ अब तक नहीं मिलीं
जो कलियाँ अब तक नहीं खिलीं
जीवन के नूतन अवसर पर
उनका मिलना-खिलना तय हो
नव वर्ष तुम्हे मंगलमय…
Added by आशीष यादव on January 1, 2020 at 12:31am — 13 Comments
सच सच बोलो आओगी ना
जब सूरज पूरब से पश्चिम
तक चल चल कर थक जाएगा
और जहाँ धरती अम्बर से
मिलती है उस तक जाएगा
चारो ओर सुनहला मौसम
और सुनहली लाली होगी
और लौटते पंछी होंगें
खेत-खेत हरियाली होगी
दिन भर के सब थके थके से
अपने घर को जाते होंगे
कभी झूम कर कभी मन्द से
पवन बाग लहराते होंगे
तुम भी उसी बाग के पीछे
आकर उसी आम के नीचे
झूम-झूम कर मेरे ऊपर
तुम खुद को लहराओगी ना
सच सच बोलो…
Added by आशीष यादव on December 22, 2019 at 10:30pm — 4 Comments
फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है।
तेरी यादों में गोते खा रहा हूँ
हवा हौले से छूकर जा रही है।
तेरी खुशबू में भीगा जा रहा हूँ।
लिपट कर चाँदनी मुझसे तुम्हारे
बदन का खुशनुमा एह्सास देती
कभी तन्हा अगर महसूस होता
ढलक कर गोद में एक आस देती
नहीं हो तुम मगर ये सब तुम्हारे
यहाँ होने का एक जरिया बने हैं
समा पाऊँ तेरी गहराइयों में
हवा खुशबू फ़लक दरिया बने हैं।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:13am — 2 Comments
जाने अनजाने में कितनी
जिसे सोचते रातें काटीं
लम्हों-लम्हों में किश्तों में
जिनको अपनी साँसें बाटीं
कभी अचानक कभी चाहकर
जिसे ख़यालों में लाता था
और महकती मुस्कानों पर
सौ-सौ बार लुटा जाता था
उसकी बोली बोल हृदय में
तुमने जैसे आग लगा दी
तुमने उसकी याद दिला दी
अँधियारी रजनी में खिलकर
चम-चम करने लगते तारे
इक चंदा के आ जाने से
फ़ीके पड़ने लगते सारे
शीतल शांत सजीवन नभ में
रजत चाँदनी फैलाता था
तम-गम में भी…
Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:00am — 4 Comments
तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या
तुम सुगंध खिलते गुलाब सी
सुन्दर कोमल मधुर ख्वाब सी
मैं मरुथल का प्यासा हरिना
ललचाती मुझको सराब* सी
तुमको पाने की चाहत में
अब तक मचल रही हैं साँसें
तुम ही कह दो तुमको अपने
प्राणों का मनमीत लिखूँ क्या
तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या
तुम शीतल हो चंदन वन सी
तुम निर्मल-जल, तुम उपवन सी
तुम चंदा सी और चाँदनी-
सी तुम हो, तुम मलय-पवन सी
नयन मूँद कर तुमको देखूँ…
ContinueAdded by आशीष यादव on December 15, 2019 at 3:00pm — 2 Comments
ये रातें जल रही हैं,
वो बातें खल रही हैं
लगा दी ठेस तुमने दिल के अंदर
नसें अंगार बनकर जल रही हैं
मौसम सर्द है,
जीवन में लेकिन
लगी है आग,
तन मन जल रहा है।
जिसे उम्मीद से बढ़कर था माना
वही घाती बना है छल रहा है।
तुम्हारी ठोकरों के बीच आकर
बहुत टूटा हुआ हूँ, लुट गया हूँ
तेरा सम्मान खोकर, स्नेह खोकर
स्वयं ही बुझ चुका हूँ, घुट गया हूँ।
यहाँ हालात क्या से क्या हुआ है
नहीं कुछ सूझता…
Added by आशीष यादव on June 1, 2019 at 5:02pm — No Comments
हम तुम
दो तट नदी के
उद्गम से ही साथ रहें हैं
जलधारा के साथ बहे हैं
किन्तु हमारे किस्से कैसे, हिस्से कैसे
सबने देखा, सबने जाना,
रीति-कुरीति, रस्म-रिवाज, अपने-पराये
सब हमारे बीच आये
एक छोर तुम एक छोर मैं
इनकी बस हम दो ही सीमाएं
जब इनमे अलगाव हुआ दुराव हुआ
धर्म-जाति का भेदभाव हुआ
क्षेत्रवाद और ऊँच-नीच का पतितं आविर्भाव हुआ
तब हम तुम
इस जघन्य विस्तार से और दूर हुए
तब भी इन्हें हमने ही हदों…
Added by आशीष यादव on April 1, 2017 at 1:30pm — 6 Comments
2122 2122 2122 212
पग सियासी आँच पर मधु भी जहर होने को है।
बच गया ईमान जो कुछ दर-ब-दर होने को है।।
मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।
यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।
उड़ रहा है जो हकीकत की धरा को छोड़ कर।
बेखबर वो जल्द ही अब बाखबर होने को है।।
वो जो बल खा के चलें इतरा के घूमें कू-ब-कू।
खत्म उनके हुस्न की भी दोपहर होने को है।।
जुल्म से घबरा के थक के हार के बैठो न तुम।
"हो भयावह रात कितनी भी सहर होने…
ContinueAdded by आशीष यादव on March 3, 2017 at 12:00pm — 18 Comments
हम मजा लूटते कितने सुख चैन से
कुछ तो सोचो, मजा पे क्या अधिकार है ?
जो शहादत दिए हैं हमारे लिए
याद उनको करो, ना तो धिक्कार है
अपना कर्तव्य क्या है धरा के लिए
फ़र्ज़ कितना चुकाया है हमने यहाँ
मैं कहानी सुनाता हूँ उस वीर की
खो गया आज है जो न जाने कहाँ
वीरता हरदम ही दुनिया में पूजी जाती है
बन के ज्वाला दुष्टों के हौसले जलाती है
ऐसे ही वीरता की गाथा आज गाता हूँ
वीर अब्दुल हमीद की कथा…
Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 2:30pm — 4 Comments
हाँ तुम सपने में आई थी
होठों पर मुस्कान सजाये
बालों में बादल लहराए
गालों पर थी सुबह लालिमा
माथे पर बिंदिया चमकाए
जब तुमको मैंने देखा था
पास खड़ी तुम मुस्काई थी
हाँ तुम सपने में आई थी…
Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 1:45pm — 10 Comments
Added by आशीष यादव on December 17, 2016 at 6:56am — 6 Comments
Added by आशीष यादव on June 2, 2016 at 11:21am — 6 Comments
Added by आशीष यादव on November 20, 2015 at 7:30am — 8 Comments
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
तुम कलकल कलरव की हो गान
हो लिपटे बेलों की वितान
तुम वसुन्धरा की शोभा हो
हे आन मान सरिता महान
तुझमे दिखता जीवन सारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
तुझमे निज-छवि लखते उडगन
यह विम्ब देख हर्षाता मन
सुषमा ऐसी नयनों मे बसा
रहता बस मे किसका तन मन
दिखता तुझमे चन्दा प्यारा
हे शान्त स्निग्ध जल की धारा
हे मिट्टी की सोंधी सुगन्ध
बाँधे सबको जो पाश…
ContinueAdded by आशीष यादव on August 5, 2013 at 11:30pm — 15 Comments
जिनके लिये हिन्द प्राण से प्यारा था।
सत्य अहिंसा ही बस जिनका नारा था।
तैंतीस कोटि जनो का जो विश्वास था।
जिसमे होता देवों का आभाष था।
जिसने देखे स्वप्न राम के राज की।
उसी हिन्द की दशा हुई क्या आज की।
सत्य बैठ कोने मे सिसकी लेता है।…
Added by आशीष यादव on March 10, 2013 at 10:30am — 7 Comments
मानव की प्रवृत्तियाँ क्या हैं? वह क्या चाहता है? क्या पसन्द है उसे? क्या नही पसन्द करता वो? ये सभी बातें उसी पर निर्भर हैं। किन्तु ये नही कहने वाला हूँ मै। कुछ और ही कहना चाहता हूँ।
कुछ लोगों को अच्छे लोग नही भाते बल्कि बुरे लोगो में दिलचस्पी हो जाती है। पता नही कैसा ये मन का रिश्ता है। क्या पता कब, कैसे, किससे जुड़ जाये। इसकी खबर भी नही लगती।
बात ये भी नही कहना चाहता मै लेकिन ये सभी घटनायें कभी न कभी अवश्य ही घटती हैं जीवन मे। इनके पीछे क्या होता है उस समय कोई नही जान सकता।…
ContinueAdded by आशीष यादव on August 20, 2012 at 10:00am — No Comments
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