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हाँ बहुत कुछ याद है

अकेले तुम नहीं यारा
तुम्हारे साथ और भी बात
मुझे हैं याद

कि जैसे फूल खिला हो
तुम हसीं, बिलकुल महकती सी
चहकती सी
 मृदुल किरणों में धुलकर आ गई
और छा गई
जैसे कि बदली जून की
तपती दोपहरी से धरा को छाँव देती
ठाँव देती हो मुसाफिर को

कि जैसे झील हो गहरी
कि ये भहरी निगाहें
काजलों की कोर ये खीँचे मुझे
भींचे कि जैसे
हार सी बाहें गले में डालकर
और ढाल कर खुद में मुझे
तुम प्यार देती
वार देती थी स्वयं को

मेरी जानाँ,
मुझे है याद यह भी
कि तेरी जुल्फें लहरकर
बादलों का रूप लेतीं
और देती प्यार की बूंदें
कि जिनमें भीगकर
तन तर हो जाता
और पाता स्नेह-
 सुख उर में समाता
याद है 

हाँ याद है
पूरब में अंगड़ाई लिए
सूरज की लाली से तुम्हारे होंठ
कि जिनसे लिपटकर खेलती मेरी तमन्ना
और तुम हँसती हुई
कोमल गुलाबों को मेरे होठों पे रखती
और मैं आनंद का परिपाग पाता
भीग जाता
याद है
हाँ याद है।

मौलिक एवं अप्रकाशित


आशीष यादव

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Comment

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Comment by आशीष यादव on October 6, 2022 at 9:07pm

आदरणीय  नाथ सोनांचली जी प्रणाम, आपकी यह टिप्पणी मेरे लिए अमूल्य है। आपको यह रचना रुची, मैं धन्य हो गया। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by नाथ सोनांचली on April 23, 2020 at 1:51pm

आद0 आशीष यादव जी सादर अभिवादन। बेहतरीन भाव सम्प्रेषण के साथ बढ़िया अतुकांत लिखा है। बधाई स्वीकारें। सादर

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