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तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम सुगंध खिलते गुलाब सी
सुन्दर कोमल मधुर ख्वाब सी
मैं मरुथल का प्यासा हरिना
ललचाती मुझको सराब* सी

तुमको पाने की चाहत में
अब तक मचल रही हैं साँसें
तुम ही कह दो तुमको अपने
प्राणों का मनमीत लिखूँ क्या
तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या

तुम शीतल हो चंदन वन सी
तुम निर्मल-जल, तुम उपवन सी
तुम चंदा सी और चाँदनी-
सी तुम हो, तुम मलय-पवन सी

नयन मूँद कर तुमको देखूँ
तुम मेरे मन पर छा जाती
कहो नयन-सुख क्या लिक्खूँ मैं
तुमको मन का प्रीत लिखूँ क्या
तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या 

*मृग मरीचिका 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

आशीष यादव

Views: 148

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Comment by आशीष यादव on December 21, 2019 at 10:07pm

आदरणीय समर कबीर सर धन्यवाद

Comment by Samar kabeer on December 21, 2019 at 5:38pm

जनाब आशीष यादव जी आदाब,अच्छी रचना हुई है बधाई स्वीकार करें ।

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