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Shanno Aggarwal's Blog (26)

''मकर-संक्रांति की यादें और पतंगें''

खुला मौसम गगन नीला

धरा का तन गीला - गीला l

पतंगों की उन्मुक्त उड़ान

तरु-पल्लव में है मुस्कान l 

मकर-संक्रांति को भारत के हर प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. और वहाँ के वासी अलग-अलग तरीके से इस त्योहार को मनाते हैं. पंजाब में इसे लोहड़ी बोलते हैं जो मकर-संक्राति के एक दिन पहले की शाम को मनायी जाती है. और उत्तरप्रदेश में, जहां से मैं आती हूँ, इसे मकर-संक्रांति ही बोलते हैं. लोग सुबह तड़के स्नान करते हैं ठंडे पानी में. और इस दिन को खिचड़ी दिवस के रूप…

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Added by Shanno Aggarwal on January 13, 2012 at 5:30pm — 7 Comments

''पल-पल फिसलती जिंदगी''

 

कोई पल ना बीतें काम के बिन हैं 

रस्ते जीवन के बहुत कठिन हैं l

 

खुशी और गम के घूँट घूँट के

अभिलाषायें मन में अनगिन हैं l

 

साँस जभी तक आस तभी तक

सिमट रहे हर पल पल-छिन हैं l

 

काया ठगती है क्षमता घटती है

और बुझती सी साँसें बैरिन हैं l  

 

ना होता हर दिन एक समाना

उम्मीदें भी लगतीं नामुमकिन हैं l

 

काम बहुत और समय रेत है

सब फिसल रहे हाथों से दिन हैं l

 

मंजिल है…

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Added by Shanno Aggarwal on September 13, 2011 at 12:30am — 2 Comments

''अन्ना की लीला'' (चार कुण्डलियाँ)

चार कुण्डलियाँ 

 

(१)

लीला है उस राम की, अन्ना यहाँ हजार    

लोग जमा हो गये हैं, छोड़ दिया घरबार  

छोड़ दिया घरबार, सह रहे आँधी-पानी

अनशन की शुरुआत, शुरू वही कहानी

भाग रही है भीड़, सभी कुछ गीला-गीला 

हे प्रभु इस…

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Added by Shanno Aggarwal on August 19, 2011 at 4:00pm — 6 Comments

''गलतियाँ''



बचपन में

एक दिन 

एक संटी को

मुँह में दबाकर

मैं गन्ना

समझ बैठी

आज लिखते हुये

फिर भूल से 

किसी के पन्ने को

मैं अपना पन्ना

समझ बैठी

न जाने कितनी

होती रहती हैं

मिस्टेक जिंदगी में

कुछ अनजाने में

कुछ नादानी में

फिर आती है

झेंप…

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Added by Shanno Aggarwal on August 4, 2011 at 6:00pm — 8 Comments

''हैवानियत की इन्तहां''

है मरने वालों की लंबी बड़ी दास्तां

कुछ मरे हैं यहाँ कुछ मरे हैं वहाँ

एक इंसा की गर्दन है अब तक बची

उसके बदले में ये सब तबाही मची

कितनी बार ऐसे हो चुके हैं हादसे  

मुजरिम है सलामत बेगुनाह जा फँसे  

आतंकी अपनी हठ पर हैं कबसे अड़े

बहाया है खून लोगों के कर लोथड़े  

कितनों का बचपन पिता बिन लुटा

सुहागिनों का सिन्दूर माँगों से छुटा

माँ-बाप के कलेजों के चिथड़े हुये

हालात देश के और भी हैं बिगड़े हुये

हमने दिये हैं सबर…

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Added by Shanno Aggarwal on July 14, 2011 at 4:00pm — 6 Comments

''फिर क्या होगा ?''

गर कोई पाठशाला न हो फिर क्या होगा

हम जैसों का इस जहाँ में फिर क्या होगा ?



मेरा गजलें लिखना तो है कोई जुर्म नहीं

मगर बिन इल्म लिखीं तो फिर क्या होगा ?



किस्मत ले आई है हमें भी इक कक्षा में  

पाठ समझ ना आये तो फिर क्या होगा ?



हुस्ने मतला का हुस्न हमसे बर्बाद हुआ

अगला मतला पतला हुआ फिर क्या होगा ?



रुक्न को समझने में रुकी हुई है अकल

फायलातुन, मुफाइलुन का फिर क्या होगा ?



रदीफ, काफिया की है हालत बड़ी नाजुक

मत्ला औ मकता… Continue

Added by Shanno Aggarwal on June 22, 2011 at 3:30am — 4 Comments

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