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शीत के मौसम से मच रही गदर है
इक्का-दुक्का ही कोई आता नजर है l

जमी बर्फ जमीं पे खामोश सा शहर है
पंछी ना चहका कोई ठूँठ हर शजर है l

होता बहुत मुश्किल निकलना घरों से
हाथ में दस्ताने और गले में मफलर है l

कांपती सी दिखती हर दूर तक डगर है
लोग बुत से चलते फिसलने का डर है l

बिन फूल-पात दिखते हैं पेड़ नंगे सारे
बस बर्फ के फूलों से ढका हुआ सर है l

दूब पर सफेदी चमकती है रजत जैसी
झुक रहे हैं तरु और धुंधली सी सहर है l

-शन्नो अग्रवाल

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Comment by Shanno Aggarwal on March 12, 2013 at 2:27am

प्रभात जी, रचना की सराहना के लिये आपका बहुत धन्यबाद. 

Comment by Shanno Aggarwal on March 12, 2013 at 2:26am

उपासना जी, आपका हार्दिक धन्यबाद.  

Comment by prabhat kumar roy on March 11, 2013 at 4:49pm

प्रकृति प्रदत्त शीत ऋतु का शानदार मनभावन चित्रण कर दिया शानो अग्रवाल ने। बहुत बधाई।

Comment by upasna siag on January 24, 2013 at 3:58pm

बहुत सुन्दर........

Comment by Shanno Aggarwal on January 23, 2013 at 2:30am

विशाल जी, आपका बहुत धन्यबाद. 

Comment by Shanno Aggarwal on January 23, 2013 at 2:29am

राजेश कुमारी जी, रचना की सराहना हेतु आपका हार्दिक धन्यबाद. 

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on January 22, 2013 at 9:34pm

वाह.........सर्दी के मौसम की एक तस्वीर बनाती सी गजल के लिये दिल से बधाई.........


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 22, 2013 at 3:16pm

बहुत सार्थक और सुन्दर  चित्र खींचा है बर्फीले मौसम का शन्नो जी हार्दिक बधाई 

Comment by Shanno Aggarwal on January 22, 2013 at 3:09am

प्राची जी, आपसे रचना पर प्रशंसा पाकर बहुत खुशी हुई...आपका हार्दिक आभार. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 21, 2013 at 6:01pm

बहुत सुन्दर आदरणीया शन्नो जी, 

बहुत सुन्दर शब्दों में बर्फीली सर्दी के नजारों को समेटा है, बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर प्रकृति की अभिव्यक्ति पर. सादर.

कृपया ध्यान दे...

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