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''हैवानियत की इन्तहां''

है मरने वालों की लंबी बड़ी दास्तां

कुछ मरे हैं यहाँ कुछ मरे हैं वहाँ

एक इंसा की गर्दन है अब तक बची

उसके बदले में ये सब तबाही मची

कितनी बार ऐसे हो चुके हैं हादसे  

मुजरिम है सलामत बेगुनाह जा फँसे  

आतंकी अपनी हठ पर हैं कबसे अड़े

बहाया है खून लोगों के कर लोथड़े  

कितनों का बचपन पिता बिन लुटा

सुहागिनों का सिन्दूर माँगों से छुटा

माँ-बाप के कलेजों के चिथड़े हुये

हालात देश के और भी हैं बिगड़े हुये

हमने दिये हैं सबर के कितने इम्तहां

और ये जलाते रहे हैं लोगों के जहां

अपने होश को दिलों में करके दफन

कितने लोगों को पहना चुके हैं कफ़न   

नफरत से तबाही मचाने में हैं मखमूर   

हिसाब इनका भी एक दिन होगा जरूर l

 

-शन्नो अग्रवाल

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Comment

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Comment by Shanno Aggarwal on July 16, 2011 at 12:06am
धन्यबाद अनीता जी.
Comment by Anita Maurya on July 15, 2011 at 7:34pm

एक इंसा की गर्दन है अब तक बची

उसके बदले में ये सब तबाही मची... kash ki is insaan ka faisla ho pata..

 

Comment by Shanno Aggarwal on July 15, 2011 at 12:08am
सतीश जी, रचना के प्रति आपकी सराहना के लिये आभार सहित बहुत-बहुत धन्यबाद.
Comment by Shanno Aggarwal on July 15, 2011 at 12:05am
गणेश, रचना की सराहना के लिये बहुत-बहुत धन्यबाद..हम सभी देश व बिदेश में रहने वाले भारतियों को बहुत दुख है इस दुर्घटना के बारे में.
Comment by satish mapatpuri on July 14, 2011 at 11:51pm

अपने होश को दिलों में करके दफन

कितने लोगों को पहना चुके हैं कफ़न  

नफरत से तबाही मचाने में हैं मखमूर  

हिसाब इनका भी एक दिन होगा जरूर l

बेहतरीन, बहुत -बहुत बधाई . शन्नो जी,उस दिन का इंतज़ार तो हर हिन्दुस्तानी को है.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 14, 2011 at 7:26pm

//एक इंसा की गर्दन है अब तक बची

उसके बदले में ये सब तबाही मची//

 

बहुत ही आक्रोश के साथ लिखी गई रचना है , आप के कथन से सहमत हूँ , बहुत ही खुबसूरत भाव है, बहुत बहुत बधाई आपको इस खुबसूरत रचना हेतु और बहुत बहुत दुःख उस घटना हेतु |

 

//इंसान की हैवानियत की होती है हद  

पर ये हैवान लांघ गये हद की सरहद//

शन्नो दीदी उक्त नीचे वाली पक्ति पर ध्यान देने की आवश्यकता है "हद की सरहद" का कोई मतलब नहीं निकलता, सरहद मतलब देश की सीमा, हद मतलब सीमा |

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